तब फिर घर लौटेगी नन्हीं चिड़िया

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birdsong will resound in homes again know how to save migratory birds
चाहते हैं कि घर में पक्षियों की चहचहाहट फिर से गूंजे, तो आदत बदलनी होगी। शहर से लेकर घरों तक, कुछ सुधार चाहिए। साउथ कोरिया के बुसान स्थित नकडोंग एस्टुअरी इको सेंटर एंड पार्क के डायरेक्टर जिनवॉन सियो (Jinwon Seo) ने गौरव खरे के साथ सेंटर के कामकाज, भारत में प्रवासी पक्षियों में आई कमी जैसे मुद्दों पर बात की। यह पार्क हजारों प्रवासी पक्षियों के संरक्षण का मुख्य केंद्र है। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश :

n प्रवासी पक्षियों के लिए हालात मुश्किल होते जा रहे हैं। ऐसे में इको पार्क के संचालन में आपको किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?
हमारे यहां हर साल रेस्क्यू यानी बचाव की जरूरत वाले वन्यजीवों की संख्या बढ़ रही है। rehabilitation सुविधाओं, खासतौर पर प्रशिक्षित कर्मचारियों और जरूरी उपकरणों की सीमित उपलब्धता समस्या है। इस कारण अचानक रेस्क्यू की जरूरतों को पूरा करने और बचाए गए वन्यजीवों की देखभाल व इलाज जारी रखने में हमें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

n साइबेरिया, यूरोप और मध्य एशिया से भारत आने वाले प्रवासी पक्षियों की संख्या अब कम होने लगी है। क्लाइमेट चेंज भी एक वजह है। इसके समाधान के लिए और क्या किया जा सकता है?

प्रवासी पक्षियों की संख्या बढ़ाने के लिए भारत समेत कई देशों को उनके प्राकृतिक आवास बचाने और बढ़ाने पर ध्यान देना होगा। बढ़ते शहरीकरण और पर्यावरण को हो रहे नुकसान के कारण सुरक्षित क्षेत्रों का विस्तार जरूरी है। जल स्रोतों का बेहतर प्रबंधन और शिकार पर रोक भी जरूरी है। बिजली की लाइनों से पक्षियों को होने वाले खतरे कम करने के लिए उन पर साफ दिखाई देने वाले निशान लगाए जाएं। बिजली और अन्य यूटिलिटी लाइनों को जमीन के नीचे किया जाए। पक्षियों के ठहरने वाली जगहों पर प्रकाश प्रदूषण कम करना भी जरूरी है। खेती वाले इलाकों में जहरीले पेस्टिसाइड और रोडेंटिसाइड के अत्यधिक इस्तेमाल को नियंत्रित करना होगा। इसके साथ ही प्रवासी पक्षियों के रास्तों की साझा निगरानी और अलग-अलग देशों के बीच सहयोग बढ़ाया जा सकता है। इससे रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। स्थानीय लोगों को टूरिज्म गाइड और बर्ड मॉनिटर के रूप में प्रशिक्षित कर उनकी आय बढ़ाई जा सकती है।

n पक्षियों के घायल होने के सबसे आम कारण क्या हैं?

हमारे सेंटर में आने वाले पक्षियों में सबसे ज्यादा मामले इमारतों से टकराने के होते हैं। इनमें भी खिड़कियों से टकराने की घटनाएं अधिक हैं। बिजली के तारों, वाहनों और दूसरी मानव निर्मित संरचनाओं की वजह से भी पक्षी घायल होते हैं।

n भारत में भी शहरीकरण तेजी से हो रहा है, तो नए निर्माण करते समय क्या कदम उठाए जा सकते हैं, जिससे विकास हो और वन्य जीवन को भी नुकसान न पहुंचे?

शहरीकरण बढ़ने के साथ पक्षियों के लिए नई मुश्किलें भी बढ़ रही हैं। ऐसे में बिल्डिंग डिजाइन में कुछ बदलाव करके उन्हें इंफ्रास्ट्रक्चर से होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है। जैसा कि मैंने बताया, सबसे ज्यादा पक्षी घायल होते हैं खिड़कियों से टकराने से, तो transparent या reflective glass पर विजुअल मार्कर लगाना चाहिए। ऐसे कांच का इस्तेमाल न करें, जो बहुत ज्यादा रोशनी रिफ्लेक्ट करते हैं। देर रात, खासकर पक्षियों के पीक माइग्रेशन पीरियड के दौरान लाइटें बंद कर देनी चाहिए। शहरी वेटलैंड्स के आसपास बफर जोन बनाएं।

n भारत समेत पूरी दुनिया में इंसानों और पक्षियों के बीच दूरी बढ़ती जा रही है। पक्षी वापस हमारे घरों में लौटें, इसके लिए हम क्या कर सकते हैं?

घर की बालकनी को पक्षियों के हिसाब से बनाइए। देसी पेड़-पौधे लगाइए। वहां साफ पानी मौजूद होना चाहिए। पक्षियों को रहने के लिए एक नैचुरल जगह चाहिए। पालतू जानवरों खासकर बिल्लियों को यहां से दूर ही रखें। छोटी हरी-भरी जगहों को जोड़कर इकोलॉजिकल कॉरिडोर बनाया जा सकता है। शहरों में पक्षियों की आबादी बढ़ाने के लिए आर्टिफिशल घोंसले भी बना सकते हैं।

n आपके सेंटर में ऐसी कौन-सी सुविधाएं हैं, जो आपके ख्याल से सभी इको पार्क में होनी चाहिए?

हमारे यहां पांच पशु चिकित्सक वन्यजीवों का इलाज करते हैं। एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, एंडोस्कोपी, इनक्यूबेटर, स्टेरलाइजर जैसे उपकरण मौजूद हैं। कई कर्मचारी हर दिन नर्सिंग और हाउसकीपिंग का काम भी संभालते हैं।

n इको पार्क में जब कोई नवजात जीव आता है, तो उसकी देखभाल कैसे की जाती है?

जब अनाथ या छोटे वन्यजीव यहां लाए जाते हैं, तो कर्मचारी उन्हें खाना खिलाते हैं, देखभाल करते हैं और तापमान व साफ-सफाई का ध्यान रखते हैं। उनके वजन, रूप-रंग और व्यवहार में होने वाले बदलावों पर नजर रखी जाती है। छोटे वन्यजीव जंगल के माहौल में ढल सकें, इसके लिए उन्हें शिकार करने और उड़ने की ट्रेनिंग भी दी जाती है।