रिकवरी एजेंट की कॉल

नवभारतटाइम्स.कॉम
recovery agents call new loan recovery rules and the growing debt trap
कुछ समय पहले तक सस्ते फोन का एक बड़ा बाजार था। आज हालात बिल्कुल अलग हैं। हर कोई अपने स्मार्टफोन में ज्यादा से ज्यादा फीचर चाहता है। अब क्या हर व्यक्ति के पास इतना पैसा है कि वह एक लाख रुपये तक का फोन आसानी से खरीद सके? नहीं, लेकिन लोन में बढ़ोतरी के कारण यह मुमकिन हो सका है। पर्सनल लोन तो पहले से था ही, अब डिजिटल लोन बिना गारंटी फटाफट मिल जाता है। Buy Now, Pay Later जैसी योजनाएं आ गई हैं। समस्या तब शुरू होती है जब भविष्य की आय, वर्तमान की उम्मीदों का साथ नहीं दे पाती। नौकरी छूट सकती है, इनकम घट सकती है, खर्चे बढ़ सकते हैं। ऐसे में जो किस्तें सहज लग रही थीं, बोझ बन जाती हैं। कई लोन चुकाने वाले डिफॉल्ट कर जाते हैं। इसके साथ ही रिकवरी के तौर-तरीकों को लेकर शिकायतों में भी इजाफा हो रहा है।

पिछले कुछ बरसों में लगातार शिकायतें सामने आईं कि रिकवरी एजेंट लोगों को मानसिक रूप से परेशान करते हैं। कुछ डिजिटल लोन कंपनियां किस्तें न चुकाने पर दूर से ही ग्राहकों के स्मार्टफोन बंद कर देती हैं। कर्ज वसूलना वित्तीय संस्थानों का अधिकार है, लेकिन क्या इसके लिए किसी व्यक्ति को मानसिक प्रताड़ना देना ठीक है? उसकी निजी जिंदगी में दखल देना या उसकी रोजमर्रा की जरूरतों को बाधित करना उचित माना जा सकता है क्या?
इन्हीं सवालों को ध्यान में रखते हुए RBI ने लोन की वसूली से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव किया है। ये 1 जनवरी 2027 से लागू होंगे। इनमें पहली बार उन मोबाइल फोन, टैबलेट और लैपटॉप के बारे में भी स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए हैं, जिन्हें खरीदने के लिए बैंक से लोन लिया गया हो। इसके तहत फोन या अन्य डिवाइस की कुछ सुविधाओं पर बैंक आगे चलकर बंदिश लगा सकेंगे। लेकिन, इसके लिए सख्त शर्तें होंगी। बैंक और उनकी ओर से काम करने वाली तकनीकी कंपनियां ग्राहक के फोन में मौजूद निजी डेटा तक पहुंच नहीं बना सकेंगी। इसका मकसद लोन वसूली को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और मानवीय बनाना है। बकाया वसूलने की प्रक्रिया में ग्राहकों की गरिमा की रक्षा होनी चाहिए। असली चुनौती उस मानसिकता को समझने की है, जिसने समाज को कर्ज आधारित उपभोग की ओर धकेल दिया है। जब सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार महंगे गैजट बन जाते हैं, तब कर्ज केवल आर्थिक साधन न रहकर जीवनशैली का हिस्सा हो जाता है। ऐसे में डिफॉल्ट केवल वित्तीय विफलता नहीं, एक सामाजिक और सांस्कृतिक संकट का संकेत भी होता है।