युवा लिखेंगे आगे की कहानी

Contributed byमनोज कुमार झा|नवभारतटाइम्स.कॉम
indias future on youth shoulders meaning of freedom and todays challenges
आजादी के दिन को उत्सव की तरह मनाना स्वाभाविक है। तिरंगा जब आसमान में लहराता है, तो उसके साथ हमारे भीतर इतिहास की अनेक स्मृतियां भी जागती हैं - बलिदान की, संघर्ष की, जेलों की, आंदोलनों की और उन अनगिनत स्त्री-पुरुषों की, जिन्होंने ऐसे भारत का सपना देखा था, जिसमें मनुष्य की गरिमा किसी सत्ता की कृपा पर निर्भर न हो। लेकिन, हर वर्ष 15 अगस्त हमसे एक असुविधाजनक सवाल भी पूछता है- जिस आजादी के लिए पिछली पीढ़ियों ने संघर्ष किया, उसका अर्थ आज की पीढ़ी के लिए क्या है?

लोकतंत्र की सार्थकता । 15 अगस्त 1947 को केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं हुआ था। यह एक नए सामाजिक और राजनीतिक स्वप्न की शुरुआत थी। महात्मा गांधी के लिए स्वराज केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं था, वह व्यक्ति की आत्मनिर्भरता, समाज की नैतिकता और सबसे कमजोर व्यक्ति की गरिमा से जुड़ा था। जवाहरलाल नेहरू के लिए स्वतंत्रता आधुनिक, वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक भारत के निर्माण का अवसर थी। और डॉ. भीमराव आंबेडकर ने हमें लगातार याद दिलाया कि राजनीतिक लोकतंत्र तभी सार्थक होगा, जब वह सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र से जुड़ सके।
केंद्र में युवा । आजादी की इन तीनों दृष्टियों को एक साथ पढ़ें तो स्पष्ट होता है कि स्वतंत्रता केवल अतीत की उपलब्धि नहीं, लगातार पूरा किया जाने वाला वादा है। हमारे विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में पढ़ने वाले लाखों छात्र भारत के भविष्य की सबसे जीवंत आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे केवल डिग्री नहीं, सम्मानजनक रोजगार चाहते हैं। वे केवल परीक्षा नहीं, ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जिसमें मेहनत का परिणाम पारदर्शिता और निष्पक्षता से तय हो। वे केवल विकास के आंकड़े नहीं सुनना चाहते, उन्हें अवसर, सुरक्षा और सामाजिक सम्मान चाहिए।

असहमति भी जरूरी । आज का युवा अनेक विरोधाभासों के बीच बड़ा हो रहा है। एक ओर डिजिटल दुनिया ने उसके सामने असंख्य संभावनाओं के दरवाजे खोले हैं, दूसरी ओर बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं की अनिश्चितता, पेपर लीक, महंगी शिक्षा और बढ़ती सामाजिक असमानता उसके भविष्य को असुरक्षित बनाती है। जब परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा टूटता है, तो केवल एक परीक्षा रद्द नहीं होती, लाखों युवाओं का समय, श्रम और आत्मविश्वास भी प्रभावित होता है। इसीलिए छात्र आंदोलनों को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानना भूल होगी। किसी विश्वविद्यालय के परिसर में उठी आवाज अक्सर समाज की गहरी बेचैनी का संकेत होती है। युवा जब सवाल पूछते हैं, असहमति व्यक्त करते हैं या अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरते हैं, तो लोकतंत्र को उसमें खतरा नहीं, अपनी जीवंतता दिखाई देनी चाहिए।

असली पैमाना । आज युवा पीढ़ी के सामने यही चुनौती है - वह कैसी आजादी चाहती है? केवल नौकरी पाने की आकांक्षा, या ऐसा आर्थिक ढांचा जिसमें श्रम को सम्मान और अवसर को न्याय मिले? आजादी का अर्थ यह भी है कि किसी युवा को अपनी जाति, धर्म, भाषा, लिंग या आर्थिक पृष्ठभूमि के कारण अपने सपनों की सीमा तय न करनी पड़े। लोकतंत्र का असली पैमाना यह नहीं कि सबसे शक्तिशाली नागरिक कितना स्वतंत्र है, बल्कि यह है कि सबसे कमजोर नागरिक कितना सुरक्षित, सम्मानित महसूस करता है।

खुद से सवाल । इसलिए 15 अगस्त को हमें केवल अतीत के नायकों को याद नहीं करना चाहिए, हमें यह भी पूछना चाहिए कि आज के युवाओं के लिए हम कैसी विरासत छोड़ रहे हैं। क्या हमारे विश्वविद्यालय स्वतंत्र विचार के स्थान बने रहेंगे? क्या हमारी परीक्षाएं निष्पक्ष होंगी? क्या रोजगार अवसर का माध्यम बनेगा या विशेषाधिकार का? क्या असहमति को देश विरोध समझा जाएगा या लोकतंत्र की स्वाभाविक भाषा माना जाएगा? भारत की स्वतंत्रता की कहानी अभी पूरी नहीं हुई है। 1947 उसका एक निर्णायक अध्याय था, अगला अध्याय आज के युवाओं को लिखना है। उनकी बेचैनी को समझना, उनके सवालों को सुनना और उनके सपनों को अवसर देना केवल सरकारों की नहीं, पूरे समाज की लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है।

(लेखक RJD के राज्यसभा सांसद हैं)