हमने भी रखा था बापू संग उपवास

Contributed byतरलाबेन शाह|नवभारतटाइम्स.कॉम
fasting with gandhiji to his death a freedom fighters poignant memories
जब देश आजाद हुआ, तब मैं लगभग 11 साल की थी। किताबों में गांधीजी, कस्तूरबा, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, लक्ष्मी बाई की तस्वीरें देखती तो लगता कि हम भी इनके जैसा बनें। स्वतंत्रता मिलने के पहले तक माहौल यह था कि इन महापुरुषों की तस्वीरें हम बच्चे छिप-छिपकर देखा करते। लगता था कि अगर किसी ने इन तस्वीरों के साथ पकड़ा, तो जेल में डाल देगा। लेकिन, जोश बहुत था हम सभी बच्चों में। गांधीजी उपवास करते, तो हमें भी खाना अच्छा नहीं लगता। कहीं कर्फ्यू लगता, कहीं गोली चलती तो हम घरों में छिप जाते।

याद है- 14 अगस्त की पूरी रात हम सोए नहीं। पैसे तो थे नहीं, गली के 10-12 साल के 25-30 बच्चों ने रद्दी जुटाई। झाड़ू से सींक निकाल कर पताकाएं बनाईं, चिथड़े बिनकर मशालें जलाई गईं और फिर हम पूरी रात गली में घूमे। और आवाज ऐसी निकली जो आज भी कानों में गूंजती है- आजादी अमर रहे, महात्मा गांधी की जय, भारत माता की जय। हमने मान लिया कि यह आजादी हमारी वजह से हुई है। 12 बजे रात से लेकर सुबह तक हम घूमते रहे। सुबह 15 अगस्त को जहां पेड़े बांटे जा रहे थे, वहां भी गए। हालांकि उस उम्र में आजादी के मायने उतने पता नहीं थे। बस यह था कि हमने कुछ हासिल कर लिया। उस दिन की याद आती है, तो आंखें नम हो जाती हैं।
1938 में हुए हरिपुरा अधिवेशन में पिताजी मुझे भी अपने साथ ले गए थे। तब मैं लगभग दो साल की थी। बाद में उन्होंने बताया कि मैं सीधे जाकर गांधीजी की गोद में बैठ गई थी। घर का माहौल बापू के विचारों में ढला था और मैं उसमें ढल गई। लेकिन, जश्न हमेशा तो रहता नहीं। एक शाम हम बच्चे खेल रहे थे। उसी समय किसी ने कहा- गांधीजी चल बसे। हमें तो यकीन ही नहीं हुआ। ऐसा हो ही नहीं सकता था। थोड़ी देर में पूरा गांव स्तब्ध हो गया। ऐसा लगा जैसे शाम को ही रात उतर आई हो। सभी मौन हो गए। इतना सन्नाटा छा गया था उस दिन, मुझे आज भी याद है। मेरे पिताजी बदहवास-से हो गए थे। तब हमारे घर में न रेडियो था और न शाम को कोई समाचार पत्र आता। भुज तब बहुत ही छोटा शहर था। उस दिन हमारे घरों में चूल्हा नहीं जला, बच्चे भी भूखे सो गए। सारे शहर में सन्नाटा पसरा हुआ था।

दूसरे दिन जब दिल्ली में उनकी शवयात्रा निकली, तो हमारे शहर में भी महात्मा गांधी की बड़ी तस्वीर पालकी में रखकर, सूत से ढंककर अंतिम यात्रा निकाली गई। मैं भी उस यात्रा में शामिल हुई थी। शाम को प्रार्थना सभा में भी गई। हम सभी सिसक-सिसक कर रो रहे थे। उस भस्म को कांडला बंदरगाह के दरिया में विसर्जित करने के लिए कृपलानी जी आए थे। मुझे याद है, तब हमने सूत काता और प्रार्थना गाई। तब मेरा छोटा मन कल्पना में डूब जाता- अगर राख के इस घड़े से महात्मा गांधी खड़े हो जाते तो कितना अच्छा होता! श्मशान यात्रा में पूरा शहर था, और गांव के बाहर प्रार्थना में भी सभी लोग आए थे। जैसी आजादी की खुशी थी, वैसा ही गम महात्मा गांधी के जाने का था।

(लेखिका वेड़छी प्रदेश सेवा समिति, तापी की अध्यक्ष हैं और समाज सेवा से जुड़ी हैं)