सुधार क्यों नहीं

नवभारतटाइम्स.कॉम
deterioration of government schools why no improvement right to education in danger
जयपुर की घटना के बाद कॉकरोच जनता पार्टी और BJP के बीच टकराव और तीखा हो सकता है। सरकारी स्कूलों के ऑडिट को लेकर शुरू हुआ अभियान अगर यहां से राजनीतिक रंग ले लेता है, तो इसमें हैरत नहीं होनी चाहिए। कांग्रेस और AAP के बयान आ ही चुके हैं। वहीं, CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके ने कहा है कि अगर 48 घंटे में संबंधित स्कूल की मरम्मत का काम शुरू नहीं हुआ और दोषियों की गिरफ्तारी नहीं हुई, तो वह जयपुर जाएंगे। BJP शासित दूसरे राज्यों में भी CJP अपने अभियान को तेज करने की कोशिश कर सकती है।

जर्जर स्थिति । लेकिन, इस घटनाक्रम के शोर में यह वाजिब सवाल रह ही जाता है कि देश के सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधरती क्यों नहीं? जिस स्कूल में निरीक्षण करने CJP की टीम पहुंची थी, वह खुद अस्थायी व्यवस्था के तहत संचालित हो रहा है, क्योंकि मुख्य इमारत बेहद जर्जर है। इससे पहले दूसरे स्कूलों की जो तस्वीरें आई थीं, उनको भी संतोषजनक नहीं कहा जा सकता।
चिंताजनक आंकड़े । सरकारी स्कूल ी शिक्षा व्यवस्था का हाल तो नीति आयोग के हालिया आंकड़े ही बता देते हैं, जिनके मुताबिक पिछले एक दशक में देशभर में 94 हजार सरकारी स्कूल बंद हुए हैं। सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालय भी 83 हजार से घटकर 79 हजार रह गए और स्टूडेंट्स की संख्या में भी गिरावट आई है। अगर कुछ बढ़ा है, तो प्राइवेट स्कूलों का ग्राफ, जो 2.88 लाख से 3.39 लाख हो गए।

बुनियादी समस्याएं । आज देश में निजी स्कूलों का नेटवर्क फैल रहा है, जबकि पहले से मौजूद सरकारी विद्यालय बिजली, पानी, टेबल-मेज जैसी बुनियादी सुविधाओं से जूझ रहे हैं। लखनऊ, उन्नाव, कन्नौज, जयपुर समेत कई जगहों पर हाल के दिनों में सरकारी विद्यालयों के स्टूडेंट्स सड़कों पर उतरे हैं। ये बच्चे वही मांग रहे हैं, जो कायदे से इन्हें मिलना चाहिए - स्कूलों में अच्छी व्यवस्था। बच्चों की आवाज असर भी डाल रही है। यूपी सरकार ने सर्वोदय विद्यालयों की व्यवस्था में व्यापक बदलाव के निर्देश दिए हैं।

शिक्षा का अधिकार । जो कदम अब उठाए जा रहे हैं, वे तो ठीक, लेकिन क्या इसके लिए स्टूडेंट्स के सड़कों पर उतरने का इंतजार किया जा रहा था? अगर बेसिक शिक्षा की बुनियाद इतनी कमजोर होगी, तो भविष्य कैसे मजबूत बनेगा? इन सवालों के जवाब जरूरी हैं। देश की बड़ी आबादी प्राइवेट स्कूलों की पढ़ाई का खर्च नहीं उठा सकती। लेकिन, इससे उनका शिक्षा का अधिकार कमजोर नहीं हो जाता।