High Courts Big Decision Jal Nigam Junior Engineers Dismissal Cancelled Order For Reinstatement
जलनिगम के जूनियर इंजिनियरों की बर्खास्तगी रद्द
नवभारतटाइम्स.कॉम•
n NBT न्यूज, लखनऊ : हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने शुक्रवार को उत्तर प्रदेश जल निगम की वर्ष 2013 की जूनियर इंजिनियर भर्ती में नियुक्त सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों की सेवा समाप्ति को अवैध मानते हुए बर्खास्तगी आदेश रद्द कर दिए। न्यायमूर्ति इरशाद अली की एकल पीठ ने राकेश प्रताप सिंह और अन्य याचिकाओं पर संयुक्त सुनवाई करते हुए कहा कि भर्ती प्रक्रिया में हुई गलती का दंड उन कर्मचारियों को नहीं दिया जा सकता, जिनकी नियुक्ति सक्षम प्राधिकारी ने स्वीकृत पदों पर नियमित चयन प्रक्रिया के तहत की थी और जिन पर धोखाधड़ी, गलतबयानी या हेरफेर का कोई आरोप नहीं था। कोर्ट ने यह भी कहा कि आरक्षण व्यवस्था को लागू करना अनिवार्य है, लेकिन आरक्षण सुधारने के नाम पर ऐसी प्रक्रिया नहीं अपनाई जा सकती जो कानून और मूल चयन प्रक्रिया के विपरीत हो।
जल निगम ने 2013 में जूनियर इंजिनियरों के 470 पदों पर भर्ती शुरू की थी। बाद में आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों से जुड़ी आपत्तियों के बाद सात जनवरी 2014 को तीन सदस्यीय जांच समिति बनाई गई। याचियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता उपेंद्र नाथ मिश्रा ने कहा कि समिति ने 15 जनवरी 2014 की रिपोर्ट में छूटे हुए आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को दूसरे चरण की 469 रिक्तियों में समायोजित करने और किसी सामान्य वर्ग अभ्यर्थी को न हटाने की सिफारिश की थी। जल निगम ने आरक्षित अभ्यर्थियों के समायोजन को तो स्वीकार किया, लेकिन सामान्य वर्ग कर्मचारियों को सेवा में बनाए रखने की सिफारिश अनदेखी कर दी।राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने 28 जनवरी 2014 को आरक्षित वर्ग की नई चयन सूची बनाने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने इस आदेश को अधिकार क्षेत्र से बाहर बताते हुए निरस्त कर दिया। बाद में 136 अतिरिक्त ओबीसी/एससी अभ्यर्थियों को नियुक्ति दी गई, जिससे 470 पदों के मुकाबले कुल नियुक्तियां 543 हो गईं और उपलब्ध रिक्तियों में समायोजन कर लिया गया। इसके बावजूद दो दिसंबर 2014 को 73 सामान्य वर्ग जेई की सेवाएं समाप्त कर दी गईं। हाई कोर्ट ने 18 दिसंबर 2014 को पहले भी यह आदेश रद्द कर जल निगम को पुनर्विचार का निर्देश दिया था। इसके बाद 23 फरवरी 2015 को जारी कारण बताओ नोटिस में सेवा समाप्ति को ‘अपरिहार्य’ बताया गया और 14 मई 2015 को फिर बर्खास्तगी आदेश पारित किया गया।
कोर्ट ने कहा कि कारण बताओ नोटिस औपचारिकता नहीं हो सकता। कर्मचारी के जवाब और कानूनी आपत्तियों पर वास्तविक विचार जरूरी है। वित्तीय कठिनाई या प्रशासनिक चूक के आधार पर वैध नियुक्ति समाप्त नहीं की जा सकती। कोर्ट ने 14 मई 2015 का आदेश रद्द करते हुए याचिकाकर्ताओं को पदों पर कार्य जारी रखने और 21 अक्टूबर 2013 से सेवा निरंतरता देने का निर्देश दिया।