जयपुर में मिले अपने और पराये

Contributed byअभिषेक मिश्र|नवभारतटाइम्स.कॉम
jaipur trip a unique confluence of own and strangers
देश की आजादी वाले दिन दफ्तर की छुट्टी थी, तो अपने एक दोस्त के साथ जयपुर की ट्रिप पर चला गया। सुबह 6 बजे नई दिल्ली से सरपट दौड़ी शताब्दी एक्सप्रेस ने 10.30 बजे जयपुर पहुंचा दिया। गुलाबी नगरी की खासियत यही दिखी कि वहां के लोग-बाग भी गुलाब की तरह ही हैं। उनकी खुशबू आपके जेहन में इस तरह समा जाती है कि आप हमेशा तरोताजा महसूस करते हैं।

खैर, उस रोज सावन की हरियाली तीज भी थी। पुराने जयपुर में छोटी चौपड़ से बड़ी चौपड़ के बीच तीज माता की झांकी निकालने का रिवाज है। सड़क के दोनों ओर हजारों की संख्या में लोग झांकी देखने के लिए घंटों खड़े रहते हैं। सुबह में जो जयपुर बहुत अपना लग रहा था, दोपहर बाद वह बेगाना-सा लगने लगा। सड़क किनारे बनी हवेलियों में विदेशियों का तो स्वागत किया जा रहा था, मगर जब अपने हमवतन वहां जाने की कोशिश कर रहे थे, तो उन्हें बाहर से ही लौटा दिया जाता। हवेली के द्वार पर खड़े शख्स से जब इसका कारण पूछा, तो उन्होंने बताया कि मालिक ने कहा है कि सिर्फ विदेशियों को ही एंट्री मिलेगी। पास खड़े एक दुकानदार ने बताया, ‘असल बात है कि जो डॉलर-पाउंड देंगे, उन्हें ही ऊपर से देखने दिया जाएगा, ताकि इन ‘मेहमानों’ को कोई दिक्कत नहीं आए।’ भीड़ में खड़े लोग भी कह रहे थे कि हमने ही कभी अंग्रेजों भारत छोड़ो कहा था और आज हमारे अपनों के कारण ही ये अंग्रेज एक बार फिर हमें ठेंगा दिखाते हुए हवेली की छत पर चढ़ रहे हैं। थोड़ी देर बाद एक बार फिर जयपुर ने अपनत्व का अहसास कराया।
झांकी देखने आईं इकॉनमिक्स की टीचर निधि, राजस्थान परिवहन विभाग में कार्यरत जॉली, NGO से जुड़ीं चेतना, मीना और राधिका से जान-पहचान हो गई। उन्हें जब पता चला कि हम पहली बार जयपुर आए हैं, तो उन्होंने ‘पधारो म्हारे देस’ वाले अंदाज में कहा कि चलिए आपको शहर की सैर कराते हैं और देसी जायका चखाते हैं। उस बीच उन लोगों ने ही अगले दिन पुष्कर की यात्रा की योजना बना दी और अगले दिन हम सात लोग पुष्कर भी पहुंच गए।

सबसे पहले सभी लोग ब्रह्मा मंदिर गए और वहां अपने लिए खास इंतजाम देखकर उनकी मेहमान नवाजी पर आश्चर्य-सा हुआ। जो लोग चंद घंटे पहले मिले थे, उनसे इतना अपनापन मिलेगा, यह तो कभी सोचा ही नहीं जा सकता। कल तक जो लोग मेरे लिए अजनबी थे, अगले ही दिन कब अपने हो गए, पता ही नहीं चला। उन लोगों से मिलकर ऐसा लगा कि कुछ लोग सच में अजनबी नहीं होते हैं। कुछ से आपकी आत्मा का रिश्ता जुड़ा होता है और शायद इसी को सोल कनेक्शन कहते हैं।