Not Every Protester Is A Rioter Supreme Courts Remark On Police Force And The Future Of Public Protests
हर प्रदर्शनकारी बलवाई नहीं
नवभारतटाइम्स.कॉम•
कॉकरोच जनता पार्टी के हालिया दिल्ली आंदोलन के दौरान पुलिस के कथित अत्यधिक बल प्रयोग की जांच के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने हाई पावर कमिटी का गठन किया है। सुनवाई के दौरान कोर्ट की टिप्पणियों से एक दूसरी, लेकिन बेहद जरूरी बहस शुरू हो गई। आगे हमें जन आंदोलनों के दौरान पुलिस बल प्रयोग के सवाल पर कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच दिलचस्प रस्साकशी देखने को मिल सकती है।
पुराना नजरिया । 1860 के दशक में बने कानूनों के आधार पर आधुनिक संस्था के रूप में विकसित भारतीय पुलिस एक खास मकसद के लिए बनाई गई थी। उसे सरकार के खिलाफ किसी जन उभार को ‘शत्रु’ समझने के लिए प्रशिक्षित किया गया था। प्रदर्शन में शामिल व्यक्ति को उसकी एसओपी (Standard Operating Procedure) ‘बलवाई’ कहती थी। क्या यह रोचक नहीं है कि आज भी प्रदर्शनकारी को बलवाई ही कहा जाता है?गोली पर बहस । 1920 के दशक से चली आ रही एक बहस आज भी जारी है कि गोली कमर के नीचे मारी जाए या एक गोली का मतलब एक जान होता है। उस समय यह माना जाता था कि अगर गोली हवा में चलाई गई या उसका असर नहीं हुआ तो भीड़ समझ सकती है कि पुलिस सिर्फ डराने के लिए फायरिंग कर रही है। ऐसे में भीड़ पुलिस पर हमला कर सकती है। जलियांवाला बाग के खलनायक ब्रिगेडियर जनरल डायर से पूछा गया कि उसे फायरिंग बंद करने का ख्याल कब आया। उसका जवाब था, 'जब गोलियां खत्म हो गईं।' आज भी अकादमिक बहसों में यह जरूर कहा जाता है कि पुलिस को कमर के नीचे फायर करने का आदेश होता है, लेकिन एसओपी में ऐसा नहीं है।
बदलाव नहीं । आजादी के बाद भी देशी शासकों ने ऐसे परिवर्तनों में दिलचस्पी कम ही दिखाई, जिनसे पुलिस के चरित्र में कोई बुनियादी फर्क आ सकता। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए उसके पास अब भी लाठी और बंदूक है। समय के साथ लाठी या गोली चलाने के पहले आंसू गैस, पानी की बौछार या रबर बुलेट जैसे कुछ कम घातक विकल्प जरूर जुड़ गए हैं, पर इनका इस्तेमाल क्षेत्रीय कमांडर के विवेक या उपलब्धता पर अधिक निर्भर करता है।
कई सवाल । 20 जुलाई को दिल्ली पुलिस द्वारा किया गया बल प्रयोग कई कारणों से विवादित हुआ। पहला बड़ा कारण तो सादे कपड़ों में लाठियां भांजते लोगों की उपस्थिति थी। ये लोग कौन थे, पुलिसकर्मी थे तो वर्दी में क्यों नहीं थे? और अगर पुलिस वाले नहीं थे, तो किसकी इजाजत से पुलिस का काम कर रहे थे? दिल्ली पुलिस जैसे साधन संपन्न बल के पास वाटर कैनन क्यों नहीं थे, यदि थे तो इस्तेमाल क्यों नहीं हुआ?
गहरा झटका । देश की राजधानी में पैलेट गन के इस्तेमाल ने जैसे लोकतांत्रिक चेतना पर ही आघात पहुंचाया है। कहा गया कि पैलेट गन से फायर RAF के एक अधिकारी ने किया। कानून-व्यवस्था की स्थिति में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल केवल राज्य पुलिस की मदद के लिए आते हैं, उनकी कोई स्वतंत्र भूमिका नहीं होती। इसलिए अगर किसी RAF अधिकारी ने पैलेट गन का इस्तेमाल किया भी है तो वह दिल्ली पुलिस के किसी सक्षम अधिकारी के आदेश पर ही हुआ होगा।
एकरूपता जरूरी । सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित समिति को अलग-अलग राज्यों और केंद्रीय पुलिस बलों में प्रदर्शनों से निपटने की एसओपी को ध्यान से देखकर उनमें एकरूपता लाने व मानवाधिकारों के प्रति सम्मान की चेतना पैदा करने का प्रयास करना होगा। पुलिस को हर प्रदर्शनकारी को बलवाई मानने की प्रवृत्ति छोड़नी होगी। बल प्रयोग करते समय गैर-घातक विकल्पों पर जोर देने की जरूरत है।
स्पष्ट निर्देश । फायरिंग का मतलब अनिवार्य रूप से किसी की जान लेना नहीं होना चाहिए। हवा में फायर करने, कमर के नीचे गोली चलाने या किसी को गंभीर चोट से बचाने के लिए बंदूक के इस्तेमाल के स्पष्ट निर्देश होने चाहिए। किसी भी पुलिस संगठन को किसी भी स्थिति में पैलेट गन के इस्तेमाल की इजाजत नहीं होनी चाहिए। बल प्रयोग के तरीकों को बदलने से अधिक उस मानसिकता को बदलने की जरूरत है, जो सरकार के किसी निर्णय से नाराज सारे नौजवानों को बलवाई मानती है। यह सिखाने के लिए लंबे प्रशिक्षण कार्यक्रमों की जरूरत होगी कि सड़क पर हर प्रदर्शन करने वालों को हम और कुछ भी कह सकते हैं, पर देशद्रोही नहीं।