विचारों को दबाकर लोकतंत्र नहीं बनता

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taslima nasrin democracy is not made by suppressing thoughts madrassas are not dens of jihad but strongholds of extremism
करीब 19 बरस तक निर्वासन में रहने के बाद पिछले दिनों कोलकाता पहुंचीं बांग्ला लेखिका और चिकित्सक तस्लीमा नसरीन ने नाइश हसन के साथ बांग्लादेश के हालात, भारत की स्थिति, यूरोप में मिली नागरिकता आदि मुद्दों पर बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश:

n 19 साल बाद कोलकाता आकर कैसा लग रहा? यहां आते ही आपके मन में पहली भावना क्या थी?
पहली भावना तो यही थी कि मैं लौट आई हूं। लेकिन, उस खुशी में एक गहरा दुख भी मिला था। जिस शहर को मैंने कभी अपनी मर्जी से नहीं छोड़ा, वहां लौटने में मुझे 19 बरस लग गए। कोलकाता मेरे लिए शहर नहीं, यह मेरी भाषा, लेखकीय पहचान, स्मृतियों और निर्वासन की कहानी का हिस्सा है। इसलिए यह कोई पर्यटन नहीं था, यह उस शहर में वापसी थी जिसे मैंने अपना घर समझा था और जिसने कभी मुझसे कहा था कि चली जाओ।

n यूरोप ने आपको नागरिकता दी, लेकिन बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल ने रहने की जगह नहीं दी। कोलकाता के लोगों से इस बार जो प्यार मिला, उस पर क्या कहेंगी?

इस प्यार ने मेरी टीस को बहुत कम किया है। सरकारों ने मेरे लिए दरवाजे बंद किए थे, पर कोलकाता के लोगों ने मुझे अपने हृदय से कभी बाहर नहीं निकाला। हवाई अड्डे से लेकर रवींद्र सदन तक, लोग घंटों तक केवल मुझे देखने, सुनने और तस्वीर लेने के लिए प्रतीक्षारत रहे। इससे मुझे समझ आ गया कि 2007 में कोलकाता के लोगों ने निष्कासित नहीं किया था, वह राजनीतिक निर्णय था। यूरोप ने मुझे नागरिकता, सुरक्षा दी। उसके लिए मैं कृतज्ञ हूं, लेकिन नागरिकता और मातृभाषा का संबंध एक जैसा नहीं होता। बंगाल ने मुझे भाषा दी, पाठक दिए, लेखिका बनाया, फिर भी मेरे रहने के अधिकार को स्वीकार नहीं किया।

n आपने कोलकाता में कहा कि ‘मदरसे जिहाद के अड्डे’ हैं। इसका आधार क्या है?

मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मेरी टिप्पणी भारत के नहीं, बांग्लादेश के मदरसों के बारे में थी। मैंने कहा भी कि मैं भारत की मदरसा व्यवस्था को भली भांति नहीं जानती, इसलिए उस पर टिप्पणी नहीं कर रही हूं। मेरी बातों को भारतीय मदरसों से जोड़कर प्रस्तुत करना गलत है। बांग्लादेश में मैंने देखा है कि वहां बच्चों को आधुनिक, वैज्ञानिक और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा के बजाय धार्मिक विधान पढ़ाए जाते हैं।

n आप मदरसों के कट्टरपंथ की बात करती हैं, लेकिन दूसरे कट्टरपंथी संगठनों को कैसे देखती हैं?

किसी संगठन का नाम हिंदू, मुस्लिम, ईसाई या किसी अन्य धर्म से जुड़ा होने से हिंसा, घृणा और धमकी स्वीकार्य नहीं हो जाती। यदि कोई हिंदू संगठन अल्पसंख्यकों को डराता है, हिंसा भड़काता है, नैतिक पहरेदारी करता है या कानून अपने हाथ में लेता है, तो मैं उसकी भी निंदा करती हूं। मेरा सिद्धांत सीधा है, मैं किसी समुदाय या इंसान के खिलाफ नहीं, उस विचारधारा के विरुद्ध हूं जो मनुष्य की आजादी, समानता और गरिमा छीनती है। मैं इस्लामी कट्टरवाद पर इसलिए ज्यादा लिखती हूं, क्योंकि मैं उसी समाज में पली-बढ़ी हूं। उस कट्टरवाद के कारण मेरे खिलाफ फतवा जारी किया गया। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं कि मैं किसी अन्य कट्टरवाद के प्रति सहिष्णु हूं।

n शेख हसीना के हटने के बाद बांग्लादेश का भविष्य आपको किस ओर जाता दिख रहा है?

मैंने शेख हसीना की सरकार की अधिनायकवादी नीतियों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध और मानवाधिकार उल्लंघनों की आलोचना की थी। लेकिन, किसी अधिनायकवादी शासक का हटना अपने-आप लोकतंत्र की स्थापना नहीं कर देता। यदि उसकी जगह भीड़तंत्र, राजनीतिक प्रतिशोध और धार्मिक कट्टरवाद आ जाए, तो वह मुक्ति नहीं है। राजनीतिक दल पर प्रतिबंध लगाकर और विरोधी विचारों को दबाकर लोकतंत्र स्थापित नहीं किया जा सकता। उसके लिए कानून का शासन, स्वतंत्र न्यायपालिका, मुक्त मीडिया और हर नागरिक के समान अधिकार आवश्यक हैं।

n बांग्लादेश में महिलाओं और अल्पसंख्यकों के जीवन के लिए कौन-से बुनियादी बदलाव जरूरी हैं?

सबसे पहले राज्य और धर्म को पूरी तरह अलग करना होगा। इसके अलावा, स्त्री और पुरुष के लिए एक समान धर्मनिरपेक्ष नागरिक कानून होने चाहिए। बच्चों के लिए आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष और सह शिक्षा वाले स्कूल जरूरी हैं। अल्पसंख्यकों पर हमले, मंदिर और घरों में तोड़फोड़, जबरन धर्मांतरण, यौन हिंसा करने वालों को राजनीतिक पहचान की परवाह किए बिना दंड देना होगा। पुलिस और न्यायपालिका को स्वतंत्र बनाना होगा। समाज को स्त्री की स्वतंत्रता स्वीकार करनी होगी।

n जब कट्टरपंथ के डर से लेखकों को दबाया जाए, तो समाज का क्या हश्र होगा?

ऐसा समाज बाहर से शांत दिखाई दे सकता है, लेकिन भीतर से सड़ने लगता है। जब लेखक डरकर लिखना बंद करते हैं, कलाकार सवाल नहीं पूछते और पत्रकार सच छिपाते हैं, तब झूठ सार्वजनिक सत्य बन जाता है।