Bus Transport System Needs Change Leave Old System Bring Competition And Efficiency
बस ट्रांसपोर्ट का सिस्टम बदलना चाहिए
नवभारतटाइम्स.कॉम•
आज तकनीक ने जिंदगी आसान बना दी है। कुछ ही पल में कैब बुक हो जाती है, मोबाइल डेटा दुनिया में सबसे सस्ता है और बैंकिंग भी हमारी अंगुलियों पर है। लेकिन, सिटी बस जैसी सार्वजनिक परिवहन सेवा अब भी खस्ताहाल है। लंबा इंतजार, बसों के आने का कोई तय वक्त नहीं, पुरानी बसें और गैर-जरूरी रूट परेशानी के कारण हैं। ऐसे में सवाल है कि करोड़ों लोगों के लिए लाइफलाइन मानी जाने वाली बस व्यवस्था अब भी पुराने ढर्रे पर ही क्यों चल रही है?
बदलाव से दूर । सरकार ने टेलिकॉम, बैंकिंग, एविएशन जैसे क्षेत्रों में सुधार कर इसमें प्रतिस्पर्धा बढ़ाई। इससे सेवाएं सस्ती और बेहतर होने के साथ उनकी पहुंच बढ़ी। कभी सरकारी नियंत्रण वाले ये क्षेत्र आज दक्षता और इनोवेशन की मिसाल बन गए हैं। इसके उलट, बस परिवहन अब भी इन बदलावों से अछूता है। अधिकतर राज्यों में परिवहन व्यवस्था की जिम्मेदारी सरकार पर है और नियामकीय ढांचा निजी भागीदारी सीमित करने वाला है। इसलिए यात्रियों को अक्सर खराब सेवा मिलती है। पुरानी व्यवस्था । सड़क परिवहन के शुरुआती बरसों में प्राइवेट ऑपरेटर्स केवल फायदे वाले रूट को तवज्जो देते थे और ग्रामीण और दूरदराज इलाकों की अनदेखी करते थे। इसे देखते हुए परिवहन को अनिवार्य सार्वजनिक सेवा माना गया और मोटर वाहन अधिनियम, 1939 और फिर मोटर वाहन अधिनियम 1988 के तहत राज्यों को रूटों का राष्ट्रीयकरण कर राज्य परिवहन उपक्रमों (STU) को अधिकार देने की व्यवस्था की गई।
बढ़ती चुनौतियां । इस व्यवस्था मकसद सभी तक सस्ती और सुलभ सेवा पहुंचाना था। लेकिन, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के साल 2022 के आंकड़े बताते हैं कि 58 में से 56 STU घाटे में हैं। बसों की अपर्याप्त संख्या, पुराना बेड़ा, सब्सिडी पर निर्भरता और आधुनिकीकरण की धीमी रफ्तार इस मॉडल की चुनौतियां उजागर करते हैं।
सरकारी अक्षमता । कई राज्यों में बसों का रूट निर्धारण और सेवा योजना यात्रियों की मांग पर नहीं, प्रशासनिक और राजनीतिक फैसलों से तय होती है। इस वजह से अब सिस्टम ऐसा हो गया है, जो न दक्षता बढ़ा पा रहा है और न बेहतर सेवाएं दे पा रहा। बाजार की कमियां दूर करने के लिए बनाई गई। यही वर्तमान व्यवस्था आज सरकारी अक्षमता का उदाहरण बन गई है।
अच्छी सेवा जिम्मेदारी । इसके बावजूद, बस परिवहन में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने का प्रस्ताव अक्सर यह कह कर खारिज कर दिया जाता है कि यह सार्वजनिक सेवा है। सार्वजनिक सेवा का अर्थ यह नहीं है कि इसे सिर्फ सरकार चलाए। सरकार की जिम्मेदारी सस्ती, सुरक्षित, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण सेवा सुनिश्चित करना है। यह लक्ष्य मजबूत नियमन के साथ सार्वजनिक और निजी, दोनों की भागीदारी से भी हासिल किया जा सकता है।
सफल रहा है मॉडल । भारत का यह मॉडल कई क्षेत्रों में सफल रहा है। निजी टेलिकॉम कंपनियां सरकारी नियमन के अधीन काम करती हैं, निजी बैंकों पर सरकार का सख्त पहरा होता है और बुनियादी ढांचे का विकास भी सरकारी और निजी साझेदारी के जरिये हो रहा है। इन मामलों में सरकार सेवा की गुणवत्ता और जनहित सुनिश्चित करती है। मगर, बस परिवहन को अब भी सरकार संचालन से जोड़कर देखा जा रहा है। इसका असर सिर्फ STU की वित्तीय स्थिति तक सीमित नहीं है, सेवा विस्तार पर भी पड़ रहा है। संसाधनों की कमी के कारण कई क्षेत्रों, खासकर दूरदराज इलाकों में पर्याप्त बस सेवाएं उपलब्ध नहीं हो पातीं।
सख्त नियम । जहां निजी ऑपरेटर की मौजूदगी भी है वहां नियम इतने सख्त हैं कि इनोवेशन की रफ्तार थम जाती है। नतीजतन, न सार्वजनिक और न ही निजी क्षेत्र अपनी पूरी क्षमता के मुताबिक काम कर पा रहा है। प्रतिस्पर्धा नहीं होने से सेवा में सुधार का भी दबाव नहीं रहता। अन्य क्षेत्रों में सुधार इसलिए भी सफल हुए क्योंकि सरकार ने संचालक की जगह नियामक और सर्विस प्रोवाइडर की भूमिका अपनाई। लेकिन बस परिवहन में सरकार अब भी योजना बनाने, संचालन करने और नियमन करने जैसी तीनों भूमिकाएं एक साथ निभा रही है। इससे व्यवस्था की प्रभावशीलता पर असर पड़ता है।
आगे बढ़ने का समय । भारत साबित कर चुका है कि प्रतिस्पर्धा और जनहित कदमताल कर सकते हैं। बैंकिंग, टेलिकॉम और एविएशन में सरकार ने नियामक की भूमिका अपनाकर बेहतर परिणाम हासिल किए। बस परिवहन में भी इसी सोच की दरकार है। मौजूदा व्यवस्था का बोझ यात्रियों और सरकारी खजाने, दोनों पर पड़ रहा है। समय आ गया है कि सार्वजनिक जवाबदेही और निजी क्षेत्र की दक्षता का संतुलन बनाते हुए राष्ट्रीयकरण के पुराने मॉडल से आगे बढ़ा जाए।