प्रेम का प्रसाद

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prem ka prasad the true meaning of devotion from vallabhacharyas story
वैष्णव आचार्य वल्लभाचार्य एक बार अपने शिष्यों के साथ यात्रा पर थे। मार्ग में उन्हें एक निर्धन ब्राह्मण मिला। उसके पास न अच्छे वस्त्र थे, न पर्याप्त भोजन और न ही रहने के लिए अच्छा घर। अभावों के बीच भी उसके चेहरे पर संतोष और हृदय में श्रीकृष्ण के प्रति अटूट श्रद्धा थी। ब्राह्मण ने विनम्रतापूर्वक वल्लभाचार्य से अपने घर भोजन करने का आग्रह किया। यह सुनकर शिष्य असमंजस में पड़ गए। उन्होंने कहा, ‘गुरुदेव, जो स्वयं दो समय का भोजन जुटाने में असमर्थ है, वह हमारा सत्कार कैसे करेगा?’ वल्लभाचार्य मुस्कराए और बोले, ‘जहां प्रेम और भक्ति का वास होता है, वहां स्वयं भगवान विराजते हैं। ऐसे निमंत्रण को अस्वीकार नहीं करना चाहिए।’ ब्राह्मण ने घर में उपलब्ध थोड़े-से भोजन को पहले भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित किया और फिर श्रद्धापूर्वक अतिथियों को परोस दिया। भोजन साधारण था, पर उसमें प्रेम और समर्पण की मिठास थी। भोजन के बाद वल्लभाचार्य ने शिष्यों से कहा, ‘भगवान को वैभव नहीं, भक्त का निर्मल हृदय प्रिय है। प्रेम से अर्पित साधारण अन्न भी अमृत बन जाता है।’ उस दिन शिष्यों ने समझा कि सच्ची भक्ति धन या आडंबर में नहीं, निष्काम प्रेम, विनम्रता और समर्पण में है।