संकट में कनॉट प्लेस का ‘मलयाली दिल’

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sardar teja singh samundri architect of sikh society and hero of the freedom struggle
कुछ विरासतें हमें जमीन, जायदाद या धन-संपत्ति के रूप में नहीं, बल्कि हमारे जीवन में संस्कार, मूल्यों और उस कर्तव्य-बोध के रूप में आती हैं, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सहज ही पहुंचते हैं। मेरे परिवार के लिए मेरे दादा सरदार तेजा सिंह समुंदरी की विरासत ऐसी ही एक अमूल्य धरोहर है। उनका नाम केवल हमारे परिवार के इतिहास का ही हिस्सा नहीं, बल्कि पंजाब, सिख समाज और भारत के स्वतंत्रता संग्राम का अमिट और अभिन्न अध्याय है।

उनके शहादत दिवस के अवसर पर उन्हें एक शहीद के साथ-साथ आधुनिक सिख समाज के प्रमुख शिल्पकार के रूप में भी स्मरण करना जरूरी है। वे शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी (एसजीपीसी) के संस्थापकों में से एक और गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के अग्रदूत थे। वे शिक्षा और जनचेतना के पक्षधर थे। सन् 1882 में संधू सिख परिवार में जन्मे सरदार तेजा सिंह समुंदरी का संबंध तरनतारन और लायलपुर ज़िले के समुंदरी कस्बे से रहा।
जब ब्रिटिश सरकार ने दिल्ली के गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब की चारदीवारी का एक हिस्सा गिरा दिया, तब सरदार तेजा सिंह समुंदरी, उसके पुनर्निर्माण के आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुए। चारदीवारी का पुनर्निर्माण अनुशासित और अहिंसक आंदोलन की सफलता का प्रतीक बना। एसजीपीसी की काउंसिल ऑफ एक्शन के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने 1922 में गुरु का बाग मोर्चा जैसे अहिंसक आंदोलन का भी सफल नेतृत्व किया था।

सन् 1923 में, सिख समुदाय में उनकी प्रतिष्ठा तब और बढ़ गई, जब श्री हरिमंदिर साहिब के सरोवर की कार सेवा का नेतृत्व करने के लिए उन्हें पंज प्यारों में चुना गया। उन्होंने पंजाब में कई शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना की। खासतौर से महिला शिक्षा को प्राथमिकता देते हुए उन्होंने सन् 1917 में सरहाली और लायलपुर में विद्यालयों की स्थापना की। 17 जुलाई 1926 को मात्र 44 वर्ष की आयु में लाहौर जेल में उनका निधन हो गया। उनके निधन पर महात्मा गांधी, पंडित मदन मोहन मालवीय, स्वामी श्रद्धानंद, सी. एफ. एंड्रूज़ और सिख नेताओं ने गहरा शोक व्यक्त किया। मास्टर तारा सिंह ने उन्हें 'संपूर्ण सिख' और भाई वीर सिंह ने उन्हें 'परम पवित्र शहीद' की उपाधि दी। उनकी शहादत ने अकाली आंदोलन को और दृढ़ता प्रदान की। हरिमंदिर साहिब परिसर में स्थित तेजा सिंह समुंदरी हॉल, उनके जीवन की अमर स्मृति और योगदान का सजीव प्रतीक है। उनके आदर्श आज भी न केवल पंजाब, बल्कि पूरे भारतवर्ष के लिए प्रेरणा का स्रोत है।