The Dilemma Of Citizenship From 1937 To Today What Is The True Proof Of Citizenship In India
1937 से चली आ रही नागरिकता की कहानी
नवभारतटाइम्स.कॉम•
जून 1937 में मलाया (मौजूदा मलेशिया) की एक सभा में हजारों भारतीय मौजूद थे। इनमें ज्यादातर वे मजदूर थे जिन्हें अंग्रेज खेती और बागानों में काम कराने के खातिर भारत से यहां लाए थे। उस सभा में जवाहर लाल नेहरू भी थे।
भाषा से पहचान । नेहरू ने तब कहा कि आजादी के बाद भारत दुनिया के हर भारतीय मूल के व्यक्ति पर दावा नहीं कर सकता। जो लोग मलाया में बस चुके हैं, उन्हें उसी को अपना मानना चाहिए। उस समय शायद यह सिर्फ एक राजनीतिक बयान हो, लेकिन इतिहास गवाह है कि इसी सोच ने भारतीयता और भारतीय नागरिकता के बीच रेखा खींच दी। उस दौर में नागरिकता बड़ा सवाल नहीं थी। ब्रिटिश साम्राज्य की सीमाओं के भीतर लोगों का लगातार आना-जाना होता था। तमिलनाडु से हजारों मजदूर मलाया और बर्मा (अब म्यांमार) पहुंचे। व्यापारी सिंगापुर गए। पहचान का आधार भाषा और संस्कृति थी, नागरिकता नहीं।बदलती गई परिभाषा । आजादी के बाद भारत में विभाजन की त्रासदी आई। नई सरकार के सामने सबसे कठिन सवाल था कि आखिर भारत का नागरिक कौन होगा। इस सवाल का पहला जवाब 1955 के नागरिकता अधिनियम के रूप में सामने आया। भारत में जन्म लेने वाला व्यक्ति भारतीय नागरिक माना जाता था, लेकिन आने वाले दशकों में यह परिभाषा बदलती चली गई।
सख्त हुए नियम । 1987 में सरकार ने कानून बदला। नए संशोधन में अब केवल भारत में जन्म लेना पर्याप्त नहीं था। माता-पिता में से एक का भारतीय नागरिक होना जरूरी हो गया। 2003 में नियम और सख्त हुए। अब या तो माता-पिता, दोनों भारतीय नागरिक हों या एक नागरिक हो और दूसरा अवैध प्रवासी न हो। यानी नागरिकता का सवाल जन्म से आगे बढ़कर परिवार के दस्तावेजों तक पहुंच गया। मलेशिया में आज भी भारतीय मूल के ऐसे परिवार हैं, जो जन्म प्रमाण पत्र, माता-पिता के रेकॉर्ड या अन्य दस्तावेजों के अभाव में नागरिकता के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
नागरिकता की पहचान । इसी बीच भारत में पहचान के कई दस्तावेज अस्तित्व में आए - राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, पैन कार्ड, आधार और पासपोर्ट। आम लोगों को लगा कि इन दस्तावेजों के बाद नागरिकता को लेकर कोई भ्रम नहीं रहेगा। लेकिन हाल में विदेश मंत्रालय के एक बयान ने इस बहस को फिर जिंदा कर दिया। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि पासपोर्ट यात्रा का दस्तावेज है, नागरिकता का प्रमाण नहीं। इसके बाद सवाल उठा कि नागरिकता का दस्तावेज है क्या?
जटिल कानून । आधार पहचान का प्रमाण है, पैन करदाता होने का, वोटर आईडी मतदाता सूची में नाम होने का, तो राशन कार्ड कल्याणकारी योजनाओं का। इनमें से कोई भी अकेले नागरिकता का प्रमाण नहीं। दरअसल, देश में ऐसा कोई एक दस्तावेज नहीं है, जिसे दिखाकर कोई व्यक्ति अपनी नागरिकता साबित कर सके। कानूनी स्थिति भी कम जटिल नहीं। विदेशी अधिनियम के तहत यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता पर सवाल उठता है, तो उसे ही साबित करना होगा कि वह विदेशी नहीं है।
आज भी सवाल । करीब 90 साल पहले मलाया में नेहरू ने भारतीय मूल के लोगों से कहा था कि वे अपने नए देश को अपनाएं। आज भारत के भीतर एक अलग सवाल खड़ा है - भारतीय नागरिक होने का अंतिम प्रमाण आखिर क्या है? 1937 से शुरू हुई यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई।