17 जुलाई का संपादकीय ‘फिर वही गलती’ पढ़ा। इस साल भी देश के बड़े धार्मिक उत्सवों में से एक जगन्नाथ यात्रा के दौरान अफरातफरी मची। यात्रा के दौरान किसी कारण कुछ श्रद्धालु गिर गए। ऐसा लगता है कि देश की प्रशासनिक व्यवस्था सुधरना ही नहीं चाहती। उम्मीद से ज्यादा श्रद्धालु पहुंच गए, यह कोई बहाना नहीं हो सकता। धार्मिक आयोजन हर साल होते हैं और अपेक्षा से अधिक भीड़ जुटती है। फिर तैयारी उस हिसाब से क्यों नहीं? भगदड़ और अव्यवस्था आम बात है। हर बार जिम्मेदार लोग पल्ला झाड़ लेते हैं। लापरवाही साफ झलकती है, पर मामले को दबा दिया जाता है। आखिर पुरानी गलतियों से क्यों नहीं कुछ सीखा जा रहा? जब तक जिम्मेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं होती, ऐसी घटनाओं पर काबू पाना मुश्किल है।
इन्द्र सिंह धिगान, किंग्जवे कैम्प कुछ होगा भी या...
पेपर लीक मामले को लेकर शिक्षामंत्री के इस्तीफे की मांग उठाते हुए दिल्ली में शुरू किया गया आंदोलन पर्यावरणविद सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल के चलते सबका ध्यान खींच रहा है। सबको वांगचुक की सेहत की चिंता है। कई के मन में डर भी घर कर रहा है कि कहीं उनका हश्र आईआईटी रुड़की के प्रफेसर जीडी अग्रवाल के आंदोलन जैसा न हो जाए? क्योंकि वांगचुक की सेहत बेहद नाजुक स्थिति में पहुंच चुकी है। दिल्ली हाई कोर्ट को दखल देना पड़ा है लेकिन सरकार में कोई सुगबुगाहट भी नहीं हो रही है। आखिर इस आंदोलन का अंजाम क्या होगा? कोई जवाबदेही की जिम्मेदारी लेगा? सुधार होगा भी या नहीं?