'नफ़ासत कायम , पर खो रही लखनऊ की शिरीं ज़ुबान'

नवभारतटाइम्स.कॉम
lucknows elegance remains but its sweet language is being lost concern over bashir badrs poetry
nNBT न्यूज, लखनऊ : गोमतीनगर स्थित एक कैफे में शनिवार की शाम बशीर बद्र की शायरी के नाम रही। मौका था ' रंग-ए-अदब ' संस्था की ओर से आयोजित कार्यक्रम एक शाम बशीर बद्र के नाम का।

इस दौरान 'फिक्र-ए-अदब' नामक सत्र में वरिष्ठ रंगकर्मी पद्मश्री डॉ. अनिल रस्तोगी ने डॉ. बशीर बद्र की सादगी को याद करते हुए कहा कि उनकी शायरी आसानी से लोगों तक पहुंचने वाली है। वे जो लिखते थे, वह आम लोगों की भाषा होती थी, जो सीधे हर दिल को छूती थी। शहर के बदलते स्वरूप पर अपनी चिंता साझा करते हुए उन्होंने कहा कि मैंने पहले लखनऊ में जो बेपनाह मोहब्बत देखी थी, वह अब कम होती जा रही है, पुराना लखनऊ अब कहीं खोता जा रहा है। लखनऊ की शिरीं (मीठी) जुबान ही कभी इसकी असली पहचान हुआ करती थी, लेकिन उर्दू और हिंदी की जो मिली-जुली 'हिन्दुस्तानी जुबान' थी, वह अब गायब हो रही है। उन्होंने कहा कि लखनऊ की नजाकत और नफासत आज भी अपनी जगह कायम है, पर इसकी ज़ुबान धीरे-धीरे खो रही है।
वहीं, वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और लेखक पार्थ सारथी सेन शर्मा ने कहा कि फैज, गालिब और मीर को समझना शायद हमारे बस की बात न हो, लेकिन बशीर बद्र ने बिना किसी नियम को तोड़े हमारे लिए ऐसा लिखा जो सीधा दिल में उतर जाता है। बातचीत के दौरान उन्होंने फिल्म 'उमराव जान' का मशहूर गीत 'जिंदगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें...' गुनगुनाकर माहौल को और भी खुशनुमा बना दिया।

इससे पहले कार्यक्रम का शानदार आगाज मिथिलेश लखनवी ने बशीर बद्र की बेहद लोकप्रिय गजलों से किया। उन्होंने 'परखने में कोई अपना नहीं रहता' और 'मैं इबादतों की तरह ये काम करता हूं ' जैसी नायाब रचनाएं सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद दास्तानगो अरशाना अजमत ने मंच संभाला और बशीर बद्र की जिंदगी से जुड़े कुछ बेहद चुनिंदा और दिलचस्प किस्से बयां किए। महफिल में मौजूद जाने-माने शायर हसन काजमी, अनीस अंसारी, मेराज हैदर और रेहान सिद्दीकी ने भी डॉ. बद्र से जुड़ी अपनी पुरानी यादें और अनुभव साझा किए। इस दौरान रुबीना अयाज, कमल हातवी, सुधांशु मनी त्रिपाठी और बलवंत सिंह ने कलाम पेश किए।