संकट में अरावली, ये बने पर्यावरण के पहरेदार

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अरावली पर्वतमाला पर संकट गहरा रहा है। अवैध निर्माणों पर कार्रवाई हुई, पर औद्योगिक कचरे की डंपिंग जारी है। फरीदाबाद के पाली, अनंगपुर और गुड़गांव के बंधवाड़ी में कचरा डाला जा रहा है। इससे जैव विविधता और भूजल पर बुरा असर पड़ रहा है। गुरुग्राम के सेक्टर-15 के नागरिक खाली मैदानों को मिनी फॉरेस्ट में बदलकर उम्मीद जगा रहे हैं।

aravalli in crisis destruction due to construction and waste citizens become environmental guardians

विश्व पर्यावरण दिवस

अरावली क्षेत्र में हर साल बड़े पैमाने पर पौधारोपण के दावे किए जाते हैं, पर हकीकत कुछ और ही बयां करती है। तेज रफ्तार निर्माण गतिविधियों और अब इंडस्ट्रियल कचरे की अनियंत्रित डंपिंग ने इस प्राचीन पर्वतमाला को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया है। लेकिन इसी अंधेरे के बीच सेक्टर-15 गुरुग्राम की रोशनी बिखेर रही है। सेक्टर के जागरूक नागरिकों ने पर्यावरण संरक्षण की एक नई मिसाल पेश की है। हर साल सरकारी स्तर पर होने वाले पौधारोपण के बड़े-बड़े दावों के बीच, यहां की आरडब्ल्यूए (RWA) और स्थानीय संस्थाओं ने जमीन पर काम करके दिखाया है। उन्होंने सेक्टर के उन खाली मैदानों को, जहां कभी लोग कूड़ा फेंका करते थे, साफ करवाकर 7 मिनी फॉरेस्ट में बदल दिया है।

अरावली बचाने की लड़ाई अधूरी, अवैध निर्माण टूटे लेकिन कचरे का संकट बरकरार

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फरीदाबाद : विश्व पर्यावरण दिवस पर जहां अरावली संरक्षण के दावे किए जा रहे हैं, वहीं फरीदाबाद में अरावली क्षेत्र को लेकर जमीनी हकीकत पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। पिछले कुछ समय में जहां प्रशासन ने अरावली वन क्षेत्र में करीब 241 अवैध निर्माणों को ध्वस्त कर अतिक्रमण हटाने की बड़ी कार्रवाई की। वहीं, पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि अरावली को सबसे बड़ा नुकसान अब इंडस्ट्रियल कचरा डंपिंग और अनियोजित गतिविधियों से हो रहा है। फरीदाबाद के पाली, अनंगपुर, अनखबीर में इंडस्ट्रियल वेस्ट डाला जा रहा है वहीं गुड़गांव से लगे अरावली क्षेत्र में बंधवाड़ी का कूड़ा करीब दो वर्षों से बड़ी मात्रा में डाला जा रहा है। आरोप है कि कचरे के ऊपर मिट्टी और रेत की परत बिछाकर उसे ढंक दिया जाता है, जिससे वास्तविक स्थिति सामने नहीं आ पाती। पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि इससे अरावली की प्राकृतिक जैव विविधता, भूजल और वन क्षेत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

उम्मीद की जगी किरण

फरीदाबाद की पहचान केवल औद्योगिक शहर के रूप में ही नहीं, बल्कि अरावली की गोद में बसे शहर के रूप में भी है। वन विभाग का मानना है कि अवैध निर्माण हटने से वर्षा जल का प्राकृतिक प्रवाह सुधरेगा और वनस्पति के पुनर्जीवित होने की संभावनाएं बढ़ेंगी। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार अरावली क्षेत्र प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्र के रूप में कार्य करता है। पिछले कई वर्षों में निर्माण गतिविधियों के कारण जल संचयन प्रभावित हो रहा था। अब बड़ी संख्या में अतिक्रमण हटने के बाद वर्षा का पानी जमीन में अधिक मात्रा में समा सकेगा, जिससे फरीदाबाद और आसपास के क्षेत्रों के भूजल स्तर को लाभ मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा खाली हुई भूमि पर प्राकृतिक रूप से वनस्पतियां विकसित होने लगेंगी।

पौधारोपण के दावों पर भी उठ रहे सवाल

अरावली क्षेत्र में हर साल बड़े स्तर पर पौधारोपण के दावे किए जाते हैं, लेकिन पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आरोप है कि अधिकांश स्थानों पर पौधों के संरक्षण और निगरानी की व्यवस्था नहीं है। कई स्थानों पर लगाए गए पौधे जीवित नहीं रह पाए, जबकि रिकॉर्ड में पौधारोपण के आंकड़े लगातार बढ़ते रहे। इसके अलावा अनंगपुर इलाके में अब भी कुछ प्रभावशाली लोगों के निर्माणों पर कार्रवाई न होने के आरोप भी समय-समय पर उठते रहे हैं। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि जहां आम लोगों के निर्माणों पर बुलडोजर चलाया गया, वहीं कुछ प्रभावशाली लोगों के बैंक्वेट और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को बचा लिया गया।

कचरे से भर दी गई है अरावली

सेव अरावली संस्था के सीनियर मेंबर कैलाश बिधूड़ी ने कहा कि अरावली को बचाने के लिए केवल प्रतीकात्मक कार्यक्रमों से काम नहीं चलेगा। उन्होंने कहा, एक तरफ अवैध निर्माणों को तोड़ने की कार्रवाई की गई, लेकिन दूसरी तरफ अरावली क्षेत्र में लगातार इंडस्ट्रियल कचरा डाला जा रहा है। अनंगपुर, अनखीर पाली क्षेत्र में पहाड़ियों को कचरे से भर दिया गया है। ऊपर से मिट्टी और रेत डालकर वास्तविक स्थिति छिपाई जाती है। इसके लिए प्रशासन को अरावली संरक्षण के लिए सख्त और पारदर्शी कदम उठाने होंगे।

ये हो रहे काम

- अरावली को बचाने के लिए काम कर रही सेव अरावली संस्था ने अरावली क्षेत्र में 23 जोहड़ विकसित किए हैं। इनमें 2 छोटे चेक डैम शामिल हैं। इसके अलावा 6 मिनी फॉरेस्ट विकसित किए गए हैं जिसमें करीब 50 एकड़ का इलाका फरीदाबाद फॉरेस्ट के नाम से जंगल बना रहे हैं।

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