शैलेंद्र पांडेय
उस बक्से के अंदर की दुनिया स्मार्टफोन जितनी बड़ी तो नहीं थी, लेकिन तब के लिए कुछ कम भी नहीं थी। कुछ तस्वीरें ही होती थीं, पर उनका आकर्षण भी लोगों को खींच लाता। ताजमहल कितना सफेद है और लालकिला कितना लाल, कई पीढ़ियों ने पहली बार उसी बक्से में देखा। चलता-फिरता थियेटर था बाइस्कोप उनके लिए। आज भी कुछ मेलों में जब यह दिखता है, तो लगता है कि समय का पहिया पीछे की तरफ घूम गया है।
यह शब्द निकला है ग्रीक भाषा से, ‘bios’ मतलब जीवन और ‘skopeein’ का अर्थ है देखना। इतिहास इसका सिनेमा के शुरुआती दिनों से ही जुड़ा हुआ है। हालांकि यूरोप और भारत में कहानी इसकी अलग-अलग चली। यूरोप में भी बाइस्कोप घूमा करते थे, लेकिन पूरे तामझाम के साथ - टेंट, प्रोजेक्टर, डांसर, कलाकार। बाइस्कोप नाम की मशीन से ही इसे यह नाम मिला था। 19वीं सदी के आखिर और 20वीं की शुरुआत में जहां यह टोली पहुंचती, उत्सव मन जाता। भारत का बाइस्कोप सादा-सा रहा, कपड़े के फीते से कंधे पर टंगा लकड़ी का डिब्बा गांव-शहर घुमक्कड़ी करता। लेकिन, मेला जमाने की ताकत इसमें भी थी।
बाइस्कोप का सबसे बड़ा आकर्षण है उसमें छिपा रहस्य। बाहर से लकड़ी का साधारण खांचा, पर अंदर बंद बिल्कुल नई दुनिया। बाहर और अंदर के बीच पुल होते हैं छोटे-छोटे झरोखे, जिन पर पड़ा होता है मोटे ग्लास का लेंस। बाहर रोशनी और भीतर अंधेरा, जादुई-सा लगता है यह विरोधाभास। इससे झांकते ही एक नया आयाम खुल जाता है। सिनेमाघरों में दर्शकों को पर्दे से बांधे रखने के लिए माहौल बनाना पड़ता है, जबकि बाइस्कोप आसपास के माहौल को ही अपना बना लेता है। बाइस्कोप वाले का गाना, आते-जाते लोगों का शोर, मेले की अनाउंसमेंट - सारी आवाजें घुलमिल जाती हैं चलती तस्वीरों के साथ। और तब देखने वाले को लगता है कि वह जयपुर के हवामहल का बस एक फोटो नहीं देख रहा, बल्कि पर्यटकों से भरे उसे शानदार महल में खुद खड़ा है - उसके एक झरोखे से बाहर की सड़क को झांकता हुआ, हवा को महसूस करता।
यही बाइस्कोप की शायद सबसे बड़ी सीख भी है। दुनिया को समझने के लिए हमेशा ज्यादा संसाधनों की जरूरत नहीं होती, कई बार बस एक झरोखा काफी होता है कल्पनाओं के दरवाजे खोलने के लिए। आज जब हमारी जेब में पूरा इंटरनेट समाया हुआ है और हर दिन हजारों तस्वीरें-विडियो-रील्स गुजरते हैं आंखों के सामने से, तब भी बाइस्कोप खत्म नहीं हुआ। नॉस्टैल्जिया से ज्यादा इसकी वजह है रोमांच और उत्सुकता। नजरों को बांधने का जो काम दुनियाभर का कंटेंट नहीं कर पाता, बाइस्कोप कर दिखाता है। स्क्रॉल की बेचैनी के बीच आज भी ठहराव को बचाकर रखा है इसने।

