हमले ने ईरान में कट्टरपंथियों को मज़बूत किया

नवभारतटाइम्स.कॉम

ईरान पर हमले से कट्टरपंथियों को मजबूती मिली है। सत्ता परिवर्तन की उम्मीद के बावजूद, अयातुल्ला अली खामेनेई के खोने के बाद भी कट्टरपंथियों की पकड़ कमजोर नहीं हुई। 1979 की क्रांति के बाद से ही विरोधियों को दबाया जा रहा है। 21वीं सदी में लोकतांत्रिक चेतना बढ़ी, लेकिन युद्ध ने दमन का मौका दिया।

हमले ने ईरान में कट्टरपंथियों को मज़बूत किया

मृत्युंजय राय

ईरान पर इस्राइल-अमेरिका के हमले के हक में दलील दी गई कि इससे वहां सत्ता परिवर्तन का रास्ता खुलेगा। कहा गया कि इस्लामिक रिपब्लिक बरसों के आर्थिक प्रतिबंधों और राजनीतिक विरोध की वजह से कमजोर पड़ चुका है। इसलिए कट्टरपंथियों का सत्ता से हटना तय है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। युद्ध में भले ही ईरान ने सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई को खो दिया, लेकिन सत्ता पर कट्टरपंथियों की पकड़ कमजोर नहीं हुई।

CIA ने शाह को दिलाई सत्ता

येगानेह तोरबाती (Yeganeh Torbati) और बोजोर्गमेहर शराफेदीन (Bozorgmehr Sharafedin) ‘STOLEN REVOLUTION: Betrayal and Hope in Modern Iran’ में लिखते हैं कि यह ईरान के लिए कोई नई बात नहीं है। उन्होंने किताब में देश में चल रहे कोई पांच दशकों के राजनीतिक उतार-चढ़ाव को पेश किया है। उन्होंने लिखा है कि बरसों से ईरान में विरोधियों को दबाया जा रहा है, फिर भी इस्लामिक कट्टरपंथियों के खिलाफ प्रतिरोध की चिंगारी सुलगती रही है।

आज जो अमेरिका, ईरान के साथ युद्ध में उलझा है, वही मौजूदा हालात की वजह भी है। जिस 1979 की क्रांति ने ईरान में इस्लामिक रिपब्लिक का रास्ता बनाया, उसकी वजह CIA है। अमेरिकी खुफिया एजेंसी ने ईरान की लोकतांत्रिक सरकार का तख्तापलट करवाकर शाह को सत्ता पर बिठाया था, जिन्हें जनता ने ठुकरा दिया। लेखकों का कहना है कि 1979 की क्रांति में इस्लामिक विद्वानों, वामपंथी, छात्र, राष्ट्रवादी और धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी - सभी शामिल थे। उन सबने बेहतर भविष्य का ख्वाब देखा था, जिसके लिए शाह का सत्ता से हटना जरूरी था।

हालांकि, क्रांति के बाद ईरान की सत्ता इस्लामिक धर्मगुरुओं-विद्वानों के हाथ आ गई। लेखकों का कहना है कि इससे वह क्रांति जो बेशुमार उम्मीदों और समानता की सोच के साथ शुरू हुई थी, उसने एक माफिया स्टेट को जन्म दिया।

1980 के दशक में इराक के साथ युद्ध की वजह से ईरान में दमन और बढ़ा। 8 साल तक चले इस युद्ध से इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प (IRGC) की ताकत काफी बढ़ गई। इस दौरान ईरान में सर्विलांस और एक तरह के स्थायी आपातकाल का दौर शुरू हुआ, जिसने वहां के लोगों की जिंदगी को हमेशा के लिए बदल दिया। किताब के पहले आधे हिस्से में लेखकों ने बताया है कि कट्टरपंथियों ने किस तरह से सत्ता पर अपना कंट्रोल बढ़ाया। दूसरे हिस्से में उन्होंने सत्ता के खिलाफ विरोध की कहानी पेश की है। इस हिस्से में लेखकों ने युवा ईरानियों की भावनाएं भी रीडर्स के सामने रखी हैं।

कैसे बढ़ी लोकतांत्रिक चेतना

लेखकों ने बताया है कि 21वीं सदी की आहट के साथ ईरान में सिविल सोसायटी फिर से मजबूत होने लगी। स्टूडेंट्स ग्रुप और साहित्यकारों के संगठनों की संख्या तेजी से बढ़ी। इससे लोकतांत्रिक भावना के लोगों में अपनी जगह बनाई। लोकतंत्र उनके लिए अजीब राजनीतिक विचार नहीं रहा। छात्र और साहित्यकार अपने संगठनों को लोकतांत्रिक आधार पर चलाते थे। इसलिए उन्हें लगने लगा कि देश भी इसी तरह से चलना चाहिए। यह भावना फिर सड़कों पर दिखी।

असल में, अमेरिका के हमला करने से पहले का ईरान बदलाव के दौर से गुजर रहा था। औरतें हक मांग रही थीं। सिविल सोसायटी संगठित हो रही थी और लोगों के रहन-सहन में भी पीढ़ीगत परिवर्तन हो रहा था। मगर इस युद्ध ने इस्लामिक कट्टरपंथियों को इनके दमन का मौका दे दिया।