सौरभ श्रीवास्तव
रुपये को गिरने से बचाने के लिए सरकार और रिजर्व बैंक तमाम उपाय कर रहे हैं, लेकिन रुपया है कि गिरता ही जा रहा है। अब कोई चीज गोल है तो लुढ़केगी ही। मैं तो कहता हूं कि रुपये को एक बार चौकोर करके भी देख लिया जाए। शायद रुक जाए।
मैंने यह सलाह अपने अर्थशास्त्री दोस्त को दी तो उसने अपनी सारी निर्मलता त्यागते हुए कहा, 'तुम मूर्ख हो। नोट भी तो गिर रहा है, वह तो चौकोर है।' मैंने कहा कि नोट तो बहुत हल्के हैं इसलिए गिर रहे हैं। अर्थशास्त्री ने मुझे ऐसे घूरा जैसे कोई घर की सफाई के बाद कोने से निकले कॉकरोच को घूरता है। उसने मुझे समझाने की कोशिश की, 'रुपये को डॉलर के सापेक्ष देखना होता है।' मैंने बात पकड़ ली, 'जैसे इस वक्त के बड़े नेता को नेहरू जी के सापेक्ष?' अर्थशास्त्री झल्ला गया, 'तुम सोशल मीडिया और चैनल देखना बंद कर दो। तुम्हारे दिमाग में गोबर जमा हो रहा है।' 'उससे बायोगैस तो बन सकती है, खाली दिमाग तो बेकार ही है।' यह वाक्य मैं कहना चाहता था पर पिटने के डर से कहा नहीं। अर्थशास्त्री दोस्त ने फिर समझाने की कोशिश की, 'हमें आर्थिक रूप से मजबूत होने के लिए ज्यादा डॉलर चाहिए।' 'पर हमारे देश में तो रुपया चलता है।' यह कहते हुए मेरे चेहरे का प्रधान भाव किंकर्तव्यविमूढ़ वाला था। अर्थशास्त्री ने सारे गुस्से को समेट कर मन के किसी कोने में डाला और संयत आवाज में कहना शुरू किया, 'देखो, हम अपनी जरूरत की ज्यादातर चीजें विदेश से खरीदते हैं, इसके लिए हमें डॉलर की जरूरत होती है। हमारे पास ज्यादा डॉलर होंगे तो अर्थव्यवस्था ज्यादा स्थिर रहेगी।' अपने चेहरे पर मासूमियत के भाव लाते हुए मैंने सवाल किया, 'अगर हमें आज भी डॉलर ही चाहिए तो हम आजाद कहां हुए। पहले वे लोग हम पर राज कर रहे थे जिनकी मुद्रा पाउंड थी, अब डॉलर वाले।' यह गूढ़ वाक्य सुनते ही रुपये के साथ अर्थशास्त्री की हालत भी गंभीर हो गई।

