शीला ने हार नहीं मानी

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सन 1933 में इंग्लैंड में शीला बोरेट बीबीसी की पहली महिला उद्घोषिका बनीं। उनकी आवाज को लेकर शुरू में विरोध हुआ और उन्हें पद से हटा दिया गया। शीला ने हार नहीं मानी और बीबीसी से जुड़ी रहीं। उन्होंने साबित किया कि समाज का विरोध अक्सर नई सोच का होता है, योग्यता का नहीं।

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सन 1933 का इंग्लैंड। तब रेडियो तेजी से लोकप्रिय हो रहा था, लेकिन समाचार और उद ्घोषणाएं केवल पुरुषों की आवाज में सुनाई देती थीं। ऐसे समय में शीला बोरेट ने एक नई शुरुआत की। वह बीबीसी की राष्ट्रीय सेवा की पहली महिला उद ्घोषिका बनीं। 20 जून 1905 को हैरो में जन्मी शीला अभिनय जगत से रेडियो में आई थीं। उनकी गंभीर और प्रभावशाली आवाज ने उन्हें यह ऐतिहासिक अवसर दिलाया। लेकिन, राह आसान नहीं थी। उनका प्रसारण शुरू होते ही बीबीसी को हजारों शिकायतें मिलने लगीं। अनेक श्रोता महिला की आवाज में समाचार सुनने के लिए तैयार नहीं थे। मात्र तीन महीने बाद उन्हें पद से हटा दिया गया। लेकिन शीला ने हार नहीं मानी। उन्होंने कहा, 'एक पद छिन सकता है, पर मेरी प्रतिभा नहीं।' इसके बाद भी वह बीबीसी से जुड़ी रहीं और नाटक, वाचन और अन्य प्रसारण कार्यों के माध्यम से अपनी पहचान बनाती रहीं। शीला बोरेट ने सिद्ध कर दिखाया कि समाज का विरोध अक्सर नई सोच का होता है, योग्यता का नहीं। धैर्य, आत्मविश्वास और निरंतर प्रयास से असफलता भी इतिहास रचने की पहली सीढ़ी बन सकती है।