सौरभ श्रीवास्तव
'उमस बहुत है, आज।' मेरा इतना कहना था कि मेट्रो में मेरे बगल में बैठे व्यक्ति ने बमककर सवाल किया, 'क्यों, कांग्रेस की सरकार में उमस नहीं होती थी?' इसके बाद हमारी बहस शुरू हो गई। गुजरात दंगे, 84 के दंगे, आजादी, गद्दारी, पटेल, नेहरू से होते हुए हम प्रथम विश्व युद्ध तक पहुंच गए। सहयात्री ने कहा, 'तुम तब क्यों नहीं बोले, जब ऑस्ट्रिया-हंगरी ने सर्बिया पर हमला किया था?' मुझे हंसी आने लगी। बहस के दौरान सवाल का जवाब, सवाल से देते हुए हम उस वक्त तक पहुंच गए, जब हम पैदा भी नहीं हुए थे। शुक्र है, मेरा स्टेशन आ गया वरना हम दोनों धरती की उत्पत्ति तक पहुंच सकते थे।
हालात ऐसे हैं कि लोग बहस में सामने वाले को नीचा दिखाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। कालीदास-विद्योत्तमा का शास्त्रार्थ इस वक्त हुआ होता तो कैसा होता? विद्योत्तमा एक उंगली दिखातीं, इस आशय के साथ कि ईश्वर एक है। कालिदास दो उंगली दिखा कर जवाब देते कि ब्रह्म और उसकी शक्ति अलग है, लेकिन शास्त्रार्थ के दौरान आसपास बैठी जनता रील बनाकर वायरल कर देती। उनके इशारों के मतलब निकाले जाते। चैनलों के प्राइम टाइम एक उंगली बनाम दो उंगली की बहस से पट जाते। बच्चों की किताबों से यह हिस्सा हटा दिया जाता। कोई लेखक इस संवाद के असली मायने लिखता तो उसे गिरफ्तार कर लिया जाता। लोग चिल्लाते, नारे लगाते - भारत एक है, दो नहीं। कालीदास को अपनी राष्ट्रभक्ति साबित करनी पड़ती। यह भी तय किया जाता कि कालीदास की विचारधारा क्या है?
मैं यह सब सोच ही रहा था कि पास ही रखी 'अभिज्ञानशाकुन्तलम्' से आवाज आई, 'हे लेखक, वर्तमान में कहीं मेरी किताब का कोई प्रसंग मत लिखना। मुझे विवाद में नहीं पड़ना। लोग मुझे भूल जाएं, यही बेहतर है।' मैंने जवाब दिया, 'आप फिक्र न करें। लोग अब बहुत कम समय के लिए ही किसी को याद रखते हैं। हर सुबह एक नया ट्रेंड सामने आता है।' मैंने किताब को शेल्फ में सबसे पीछे छिपा दिया हैं। कालीदास सुकून में हैं।


