क्रेडिट लेने की होड़ में शामिल नहीं होता शू रैक

नवभारतटाइम्स.कॉम

फ्लोरिडा की पीटर सिस्टर्स को पिता से मिले जूतों का विशाल संग्रह मिला है। यह संग्रह उन्हें जीवन के महत्वपूर्ण सबक सिखाता है। शू रैक हमें सिखाता है कि हर चीज की एक निश्चित जगह होती है। यह व्यवस्था बनाए रखने में मदद करता है।

क्रेडिट लेने की होड़ में शामिल नहीं होता शू रैक

विरासत में लोग जमीन-जायदाद और पैसे चाहते हैं, लेकिन अमेरिका के फ्लोरिडा की पीटर सिस्टर्स को मिले लगभग 5000 जूते। इन्हें उनके पिता डगलस पीटर तब से जमा कर रहे थे, जब वह किशोर थे। 2012 के आसपास उन्होंने अपने इस शौक को अपनी 3 बेटियों - एरियाना, ड्रेस्डेन और डकोटा को सौंप दिया। तीनों ने इस कलेक्शन में हजार जोड़ी से ऊपर जूते और जोड़ लिए हैं। इनमें कई रेयर प्रोटोटाइप स्नीकर्स भी हैं, जिन्हें खास सिलेब्रिटी के लिए डिजाइन किया गया था। हालांकि ये बहनें अब भी 'शू लेडी' के नाम से मशहूर रहीं Darlene Flynn से काफी पीछे हैं, जिन्होंने कैलिफोर्निया के अपने घर में लगभग 15 हजार जोड़ी जूते जुटाए थे और गिनीज बुक में नाम दर्ज कराया था।

इस टक्कर का तो नहीं, लेकिन जूते-चप्पलों का छोटा-मोटा कलेक्शन आम घरों में भी होता है। आमतौर पर लोग तारीफ करते हैं ड्रॉइंग रूम, किचन या बाहरी एलिवेशन की, इंटीरियर और फर्नीचर की, पर शायद ही कभी ध्यान जाता हो शू रैक की तरफ। चौखट लांघने से पहले सामना होता है इसका और फिर भी यह ख्यालों में नहीं चढ़ता, क्योंकि इसे श्रेय बटोरना जो नहीं। जीवन के कई महत्वपूर्ण सबक सिखा सकता है यह छोटा-सा फर्नीचर।

जब हम घर से बाहर निकलते हैं, तो धूल, मिट्टी, धुआं, पसीना - सब सन जाता है जूतों में। शू रैक वह जगह है, जहां इनको छोड़ा जा सकता है। यह ऐसा ही है, जैसे दिनभर की थकान को दरवाजे के बाहर ही उतार देना। शू रैक बहुत ही सहजता से इन सबको अपने ऊपर लाद लेता है। साथ ही हमें यह भी सिखाता है कि हर चीज की एक निश्चित जगह होती है, भले ही उसे बार-बार इधर से उधर टहलाना पड़े, लेकिन आखिर में वह रखी जानी चाहिए वहीं। इस व्यवस्था से ही बिखराव रोका जा सकता है। वरना तो घर में जितने लोग होते हैं, उतने ही रूप-रंग, आकार के जूते-चप्पल। अगर इनके मन पर छोड़ दिया जाए, तो सब तितर-बितर हो जाएगा। शू रैक इनको बांधकर रखता है। परिवार, दोस्तों की टोली और सोसायटी में भी कुछ लोग इसी नेचर के होते हैं, सभी को एकजुट रखने की कोशिश करने वाले।

सोने-चांदी से लेकर चमड़े तक, जैसे जूते होते हैं कई किस्म के, वैसे ही होते हैं शू रैक भी - कुछ सौ से लेकर कस्टम-मेड करोड़ों की कीमत तक के। लेकिन, समानता का भाव इन सभी में मिलेगा। शू स्टैंड में पहुंच कर हर जूता-चप्पल बराबर हो जाता है। वहां किसी को विशेष दर्जा नहीं मिलता। जीवन में भी पद-प्रतिष्ठा महत्वपूर्ण हैं, पर एक वक्त तक ही। आखिर में सब दरवाजे के इस पार ही छूट जाना है।

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