लोकतंत्र की मज़बूती के लिए अमीर हैं ज़रूरी

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लोकतंत्र में अमीरों की भूमिका पर नई बहस छिड़ गई है। कुछ लोग मानते हैं कि अमीरों की बढ़ती दौलत समाज में असमानता बढ़ाती है। वहीं, एक नई किताब तर्क देती है कि अमीर लोकतंत्र में स्थायित्व लाते हैं। वे पत्रकारों और शिक्षाविदों जैसे प्रभावशाली समूहों के सामने संतुलन बनाते हैं।

the role of the rich in strengthening democracy a new debate

मृत्युंजय राय

अमेरिका में अमीरों के और अमीर होने और मध्य वर्ग की आर्थिक समृद्धि के रुकने को लेकर पिछले कुछ दशकों में काफी चर्चा हुई है। वहां शीर्ष 1 पर्सेंट यानी सर्वाधिक अमीरों के खिलाफ ऑक्युपाय वॉल स्ट्रीट जैसे आंदोलन भी हुए। समाज में गैर-बराबरी बढ़ने पर अस्थिरता बढ़ने की दलील दी जाती रही है। अमेरिका में सर्वाधिक अमीरों पर टैक्स लगाने की मांग भी होती रही है। ऐसी मांग करने वालों में बर्कशायर हैथवे के संस्थापक वॉरेन बफेट भी शामिल रहे हैं, जो खुद दुनिया के शीर्ष अमीर लोगों में शामिल हैं।

भारत में भी बहस

अमीरों को लेकर अमेरिका में यह बहस इसलिए मायने रखती है क्योंकि वह दुनिया का सबसे ताकतवर लोकतंत्र है और उसकी अर्थव्यवस्था भी सबसे बड़ी है। दूसरी तरफ, भारत जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, यहां भी समाज में बढ़ती असमानता को लेकर पिछले कुछ दशकों में बहस हुई है। जाने-माने अर्थशास्त्री टॉमस पिकेटी और भारत में फाइनैंशल टाइम्स के संवाददाता रहे जेम्स क्रैबट्री ने भी देश में बढ़ती असमानता को लेकर लिखा है।

जेम्स ने अपनी किताब बिलियनेयर्स राज में लिखा है कि आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत में आर्थिक असमानता शीर्ष स्तर पर पहुंच गई है। उन्होंने इसके लिए क्रोनी कैपिटलिज्म यानी सांठगांठ वाले पूंजीवाद को भी कसूरवार ठहराया है। ऐसे जानकार इस बात को लेकर भी आगाह करते आए हैं कि आर्थिक असमानता देश की सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था के लिए चुनौतियां पैदा करती है। हालांकि, Why Democracy Needs the Rich नाम की किताब में जॉन ओ मैकगिनीस ( John O. McGinnis ) ने लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में वेल्थ का बचाव किया है। वह लिखते हैं कि अमीर ऐसे समाज में जरूरी स्थायित्व लाते हैं।

जॉन ने इस सोच को चुनौती दी है कि अरबपति ताकतवर होने की वजह से लोकतंत्र के नियमों की अनदेखी करते हैं। उनका कहना है कि असल में अमीर दूसरे प्रभावशाली समूहों के सामने संतुलन स्थापित करते हैं। ऐसे समूहों में उन्होंने पत्रकारों, अकादमिक जगत और एंटरटेनमेंट की दुनिया के लोगों को शामिल किया है। जॉन का कहना है कि ऐसे समूह लोगों की सोच बनाने-बदलने में भूमिका निभाते हैं, लेकिन इनका कोई चुनावी उत्तरदायित्व नहीं होता। दूसरी ओर, अमीर सिविक संस्थाओं को पैसा देते हैं, वे विविध विचारों को बढ़ावा देने के साथ इनोवेशन में भी अहम भूमिका निभाते हैं। इससे किसी एक समूह का वैचारिक रूप से दबदबा नहीं बन पाता।

वैचारिक विविधता पर जोर

जॉन ने लिखा है कि अमीरों की परोपकारी वृत्ति की वजह से कई देशों में कला, शिक्षा और सिविल सोसायटी ने तरक्की की। उन्होंने इस संदर्भ में टेक्नॉलजी की दुनिया के दिग्गजों का जिक्र किया है। जॉन का दावा है कि इन लोगों की ओर से लाए गए प्लैटफॉर्म्स ने सूचना के लोकतांत्रिकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह अपनी किताब में लिखते हैं कि अमेरिका जैसे देशों में पब्लिक ओपिनियन, लॉबिंग और नौकरशाही की वजह से नीतियां बदलने का दबाव होता है, लेकिन अमीरों पर किसी समूह का दबाव नहीं होता। इसलिए उन्हें जो सही लगता है, वे ऐसी बातों को बढ़ावा देते हैं।

हालांकि, जॉन को इस बात पर भी गौर करना चाहिए था कि कई बार राष्ट्रपति चुनाव में प्रत्याशियों की फंडिंग कर अमीर अपने हिसाब से अमेरिका में नीतियां भी बनवाते हैं। कई बार वे ऐसी नीतियों की वकालत करते हैं, जिनसे सिर्फ उनका फायदा होता है। यहां उन्हें अपने हितों की चिंता होती है।

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