टीवी, मोबाइल के शोर में ज़रूरी है मौन की तलाश

Contributed byविनोद कुमार यादव|नवभारतटाइम्स.कॉम

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में शोरगुल के बीच मौन की तलाश आवश्यक है। यह हमें स्वयं से जुड़ने का अवसर देता है। मौन केवल चुप रहना नहीं, बल्कि मन की अनावश्यक हलचलों को शांत करना है। प्रकृति भी हमें मौन का महत्व सिखाती है। भारतीय परंपरा में मौन को आत्मज्ञान का मार्ग माना गया है।

the search for silence in a noisy world a divine gateway to self discovery

आज हम हर क्षण शब्दों, ध्वनियों और सूचनाओं से घिरे रहते हैं। बाहर वाहनों का शोर है, घरों में मोबाइल फोन और टेलीविजन की आवाजें। भीतर मन में भी अनगिनत विचारों का कोलाहल चलता रहता है। इस निरंतर शोर के बीच सबसे बड़ी विडंबना यह है कि मनुष्य स्वयं को सुनना भूलता जा रहा है। नतीजतन उसका अपने भीतर की चेतना और आत्मा से संबंध धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है। ऐसे समय में मौन केवल चुप रहने की अवस्था नहीं, आत्मा तक पहुंचने का एक दिव्य द्वार बन जाता है।

वास्तविक मौन का अर्थ शब्दों का अभाव नहीं, मन की अनावश्यक हलचलों का शांत हो जाना है। जब विचारों का अनवरत प्रवाह थमता है, तब व्यक्ति अपने भीतर की गहराइयों से परिचित होने लगता है। प्रकृति हमें निरंतर मौन का महत्व सिखाती है। उगता हुआ सूर्य बिना किसी शोर के प्रकाश फैलाता है, चंद्रमा शांत रहकर संसार को आलोकित करता है और वृक्ष बिना कुछ कहे छाया व फल प्रदान करते हैं। समुद्र की गहराई जितनी अधिक होती है, वह उतना ही शांत दिखाई देता है। इसी प्रकार, जिस व्यक्ति के भीतर आत्मिक गहराई होती है, उसके व्यक्तित्व में भी सहज शांति और संतुलन झलकता है।

भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में मौन तप और साधना का बेहतर माध्यम माना गया है। ऋषि-मुनि वर्षों तक मौन साधना करते थे। उनका उद्देश्य संसार से दूर भागना नहीं, अपने भीतर के सत्य को पहचानना था। गौतम बुद्ध का भी मानना था कि जब हमारे शब्द न तो सत्य हों और न ही आवश्यक, तब मौन ही सर्वोत्तम विकल्प है। मौन हमें अनावश्यक विवादों, प्रतिक्रियाओं और मानसिक अशांति से बचाकर आत्मचिंतन, धैर्य और विवेक की ओर ले जाता है।

आज मनुष्य बाहर की दुनिया से तो लगातार जुड़ रहा है, पर स्वयं से दूर होता जा रहा है। इसलिए प्रतिदिन कुछ क्षणों का मौन मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। मौन हमें सुनना सिखाता है, और सुनना केवल कानों का नहीं, आत्मा का गुण है। यही मौन अंततः हमें अपने वास्तविक स्वरूप के निकट ले जाता है।

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