महिलाओं का अधिकार

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बीसवीं सदी के मध्य में भारत के संविधान और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार घोषणा पत्र में महिलाओं के अधिकारों को महत्वपूर्ण स्थान मिला। भारत की प्रतिनिधि हंसा मेहता ने घोषणा पत्र के मसौदे में 'सभी पुरुष' की जगह 'सभी मानव' शब्द जुड़वाकर महिलाओं की समानता को सुनिश्चित किया। भारत ने इन सिद्धांतों को तुरंत अपनाया।

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20वीं शताब्दी के पांचवें दशक के अंत में विश्व स्तर पर दो ऐतिहासिक दस्तावेज तैयार हो रहे थे। पहला, भारत का संविधान। इसमें स्त्री-पुरुष, दोनों को बिना किसी भेदभाव के समान नागरिक, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकार दिए जा रहे थे। दूसरा, संयुक्त राष्ट्र का मानवाधिकारों का घोषणा-पत्र के प्रारूप को तैयार करने में भारत की प्रतिनिधि हंसा मेहता की महत्वपूर्ण भूमिका थी। मसौदे में लिखा गया था, ‘All men are born free and equal (सभी पुरुष जन्म से स्वतंत्र और समान हैं)। ’ डॉ. मेहता ने इस पर आपत्ति जताई, क्योंकि यह वाक्य महिलाओं को समुचित स्थान नहीं देता था। उनके हस्तक्षेप के बाद ‘All men‘ को बदलकर ‘All human beings’ किया गया, जिससे महिलाओं की समानता को स्पष्ट मान्यता मिली। उस समय अनेक देश इन अधिकारों को लागू करने से हिचक रहे थे। लेकिन, भारत ने समानता के सिद्धांतों को तत्काल स्वीकार किया। भारतीय संविधान में महिलाओं के समान अधिकार और संपत्ति संबंधी अधिकारों के लिए हंसा मेहता का संघर्ष उनके दूरदर्शी नेतृत्व और महिला सशक्तिकरण के प्रति समर्पण का प्रेरक उदाहरण है।

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