सुधार का मौक़ा

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लोकतंत्र में चुनाव कराना एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। जनता को चुनाव कराने वाली संस्था की निष्पक्षता पर भरोसा होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। सरकार का नियंत्रण नियुक्ति प्रक्रिया में अधिक दिखाई देता है। निष्पक्षता की शुरुआत नियुक्ति से ही होती है। चुनाव आयोग को स्वतंत्र दिखना चाहिए।

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लोकतंत्र में चुनाव कराना बस एक जिम्मेदारी भर नहीं, इसी पर पूरी व्यवस्था की बुनियाद टिकी है। जनता को केवल चुनावी प्रक्रिया नहीं, इसे कराने वाली संस्था की निष्पक्षता का भी भरोसा होना चाहिए। मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इसी चिंता की ओर इशारा करती है।

सरकार का नियंत्रण । अभी की व्यवस्था के तहत CEC की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और एक कैबिनेट मिनिस्टर की सदस्यता वाली समिति करती है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी पर सवाल उठाया है कि मंत्री तो स्वाभाविक रूप से पीएम के पक्ष में ही खड़े होंगे। ऐसे में विपक्ष के नेता अगर किसी तरह की असहमति भी जताते हैं तो उसका कोई मतलब नहीं। यह व्यवस्था एक तरह से केवल रायशुमारी का दिखावा करती है, जबकि नियुक्ति का पूरा नियंत्रण सरकार के पास ही होता है।

निष्पक्षता की शुरुआत । शीर्ष अदालत ने मार्च 2023 में अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा था कि CEC और दूसरे चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनने वाले पैनल में पीएम, नेता विपक्ष और CJI होने चाहिए। उसी साल दिसंबर में सरकार एक कानून लेकर आई, जिसमें CJI की जगह कैबिनेट मिनिस्टर को शामिल कर लिया गया। अब अदालत ने कहा है कि जरूरी नहीं CJI ही समिति में हों, लेकिन कोई स्वतंत्र सदस्य जरूर होना चाहिए। तीसरे सदस्य पर सुप्रीम कोर्ट का इतना जोर इसलिए है ताकि नियुक्ति हर तरह के संदेह से परे हो। जैसा कोर्ट ने कहा, निष्पक्षता की शुरुआत नियुक्ति से ही होती है।

विपक्ष में असहजता । कोर्ट की टिप्पणियों का यह अर्थ नहीं कि उसने सरकार या चुनाव आयोग की मंशा पर सवाल उठाए हैं। हां, यह जरूर है कि नियुक्ति प्रक्रिया में अगर सरकार का प्रभाव बहुत अधिक दिखेगा, तो तमाम अच्छे कामों के बावजूद संदेह की गुंजाइश बनी रहेगी। चुनावों में अब विपक्ष और आयोग के बीच का टकराव आम हो चुका है, जिसे स्वस्थ लोकतंत्र के नजरिये से ठीक नहीं माना जा सकता। इससे जनता के मन में भी बेवजह का शक पैदा होता है।

स्वतंत्र दिखे । चुनाव आयोग में नियुक्तियां पद भरने नहीं, पूरी चुनावी व्यवस्था पर विश्वास से जुड़ी हैं। यह संस्था जितनी स्वतंत्र और दबावों से मुक्त होगी, उतना ही बेहतर काम कर सकेगी। किसी सरकार से जुड़ी यह नहीं दिखनी चाहिए। आयोग की सबसे बड़ी पूंजी उस पर जनता का भरोसा है। इस सुनवाई को व्यवस्था में सुधार के मौके के रूप में लेना चाहिए।