पश्चिम बंगाल में नई सरकार का गठन हो चुका है। मुद्दा एक बार फिर विकास, रोजगार और सुशासन बन गया है। चुनावी शोर थम गया। लेकिन, कुछ सामाजिक सच्चाई हर बार की तरह इस बार भी बहस से बाहर रही। कोलकाता का सोनागाछी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां सत्ता बदलने के बाद भी हालात नहीं बदलते।
मैंने देखा है कि कैसे पूरे देश से ट्रैफिकिंग की शिकार लड़कियां यहां हर रात ग्राहकों का इंतजार करने को मजबूर दिखती हैं। वहां की तंग गलियों में सस्ते इत्र, धुएं और दबे हुए दर्द की गंध घुली रहती है। आजादी से पहले पनपी यह बस्ती कांग्रेस, वामपंथी शासन और फिर तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लंबे दौर में भी जस की तस बनी रही। हर सरकार ने सहानुभूति दिखाई, लेकिन ठोस बदलाव की राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं।
बंगाल की राजनीति में सोनागाछी को संवेदनशील क्षेत्र कहा जाता है, लेकिन यह संवेदनशीलता अक्सर केवल भाषणों तक सीमित रहती है। चुनावी रैलियों में करुणा दिखाई देती है, मगर सरकार बनने के बाद वही मुद्दे फाइलों में दबकर रह जाते हैं। मैंने देखा है कि कैसे सोनागाछी में हजारों महिलाएं अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। राज्य सरकार की स्वावलंबन संबंधी योजनाएं वैकल्पिक रोजगार और कौशल विकास की बात जरूर करती हैं, लेकिन कोई व्यापक नीतिगत बदलाव दिखाई नहीं देता। समस्या यह है कि अधिकतर सरकारी योजनाएं रेस्क्यू एंड रिहैबिलिटेशन मॉडल तक सीमित हैं। सिलाई, ब्यूटी वर्क या अन्य छोटे रोजगारपरक कौशलों का प्रशिक्षण देकर यह मान लिया जाता है कि महिलाएं इस पेशे से बाहर आ जाएंगी। लेकिन उसके बाद स्थायी रोजगार, सामाजिक स्वीकृति और सुरक्षा का ढांचा न होने के कारण अधिकतर महिलाएं फिर उसी चक्र में लौट जाती हैं।
समाज अब भी सेक्स वर्कर्स को नीची नजर से देखता है। जब तक इसे अधिकार, गरिमा और विकल्प के दृष्टिकोण से नहीं देखा जाएगा, तब तक कोई भी योजना अधूरी रहेगी। ये महिलाएं चुनाव के समय मतदाता सूची की संख्या बन जाती हैं, लेकिन नीति निर्माण की मेज पर उनके लिए कोई जगह नहीं होती। फिर भी कुछ सकारात्मक उदाहरण मौजूद हैं। सामुदायिक प्रयासों के कारण HIV संक्रमण दर में कमी आई है। सोनागाछी प्रॉजेक्ट और वहां चल रहे नि:शुल्क क्लिनिक स्वास्थ्य जागरूकता के महत्वपूर्ण मॉडल बने हैं। ट्रैफिकिंग रोकने और बच्चों की शिक्षा के लिए भी कुछ प्रभावी पहल हुई हैं। इससे साबित होता है कि समाधान असंभव नहीं, लेकिन व्यापक राजनीतिक समर्थन और संसाधनों की जरूरत है।


