न्यायिक जवाबदेही पर चर्चा फिर शुरू हो गई है। वजह हैं भ्रष्टाचार के आरोप से घिरे न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा। उन्होंने इस्तीफा दे दिया है, पर खबरों के मुताबिक चूंकि राष्ट्रपति ने अभी तक स्वीकार नहीं किया तो वह पद पर बने हुए हैं। जस्टिस वर्मा जब दिल्ली हाईकोर्ट में तैनात थे, तब उनके सरकारी आवास के आउटहाउस से करोड़ों रुपये के जले नोट बरामद हुए थे। जल्दबाजी में उनका ट्रांसफर इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया गया, जिसका वहां के वकील संघों ने विरोध भी किया था।
कई मुद्दे । न्यायिक जवाबदेही के दायरे में भ्रष्टाचार के अलावा और कई मुद्दे आते हैं। मसलन, अपनी सीमा रेखा भूलकर दूसरों के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण, आम आदमी के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में कई बार विफल रहना, सूचना अधिकार अधिनियम को अपने ऊपर लागू न होने देना, मुकदमों का दशकों लंबित रहना।
जजों को छूट । सरकारी अधिकारी और मंत्री आरोप के आधार पर गिरफ्तार कर लिए जाते हैं। उन्हें पद छोड़ना पड़ता है और उनके खिलाफ मुकदमा चलाया जाता है। न्यायाधीशों के मामले में ऐसा नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की एक कमिटी ने जस्टिस वर्मा को दोषी करार देते हुए उन्हें हटाए जाने की अनुशंसा की थी। जस्टिस वर्मा ने जांच प्रक्रिया को शीर्ष अदालत में चुनौती दी, जो खारिज हो गई। उन्हें पद से हटाने के लिए संसद में प्रस्ताव लाया गया। आम बातचीत में इसे महाभियोग कहते हैं। हालांकि संविधान में यह शब्द नहीं है।
दोहरा पैमाना । उनके त्यागपत्र के बाद महाभियोग प्रस्ताव निष्फल हो गया है। अतीत में कुछ अवसरों पर न्यायाधीशों के खिलाफ ऐसे प्रस्ताव संसद में लाए गए, लेकिन पारित एक भी नहीं हुआ। केवल न्यायमूर्ति सौमित्र सेन के विरुद्ध राज्य सभा में प्रस्ताव पारित हुआ और लोकसभा इस पर विचार करती, इसके पहले उन्होंने इस्तीफा दे दिया। किसी सरकारी कर्मी का इस्तीफा निगरानी विभाग की क्लीन चिट के बिना स्वीकार नहीं किया जाता। फिर न्यायाधीशों के मामले में दोहरा मापदंड क्यों?
पटेल की सोच । जब संविधान लिखा जा रहा था तब फेडरल कोर्ट (जो बाद में सुप्रीम कोर्ट बना) के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल को पत्र लिखा कि न्यायपालिका की स्वायत्तता सुनिश्चित की जाए। पटेल ने तुरंत जवाब दिया कि न्यायाधीश नैतिक अभिभावक की भूमिका में होंगे, इसलिए उन पर किसी तरह की निगरानी की जरूरत नहीं होगी। इसी वजह से भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1947 में न्यायाधीशों के बारे में सीधी चर्चा नहीं है। इसकी धारा 2 में कहा गया है कि जन सेवक (पब्लिक सर्वेंट) की परिभाषा वही है, जो भारतीय दंड विधान की धारा 21 में है। इसमें न्यायाधीश को भी शामिल किया गया है।
सुप्रीम सुरक्षा । 1964 में के. संथानम कमिटी की रिपोर्ट में भी न्यायाधीश के ऊपर चर्चा नहीं है। यानी यह माना गया कि न्यायिक भ्रष्टाचार एक विरलतम चीज होगी। के. वीरास्वामी मामले (1991) में उच्चतम न्यायालय की एक संविधान पीठ ने माना कि भारतीय दंड विधान की धारा 21 के तहत न्यायाधीश जन सेवक हैं, लेकिन व्यवस्था दी कि उच्च या उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश की पूर्व अनुमति अनिवार्य होगी। न्यायाधीश और न्यायपालिका की स्वायत्तता के लिए यह सुरक्षा शायद जरूरी है।
केस क्यों नहीं । लेकिन, वीरास्वामी मामले में तय व्यवस्था के अनुसार सरकार ने CJI से जस्टिस वर्मा के खिलाफ केस दर्ज करने की अनुमति क्यों नहीं मांगी? सुप्रीम कोर्ट भी स्वयं संज्ञान लेकर केस दर्ज करने का आदेश दे सकता था। अगर किसी मंत्री या सरकारी अधिकारी पर ऐसे आरोप लगते, तो सिर्फ पद छोड़ देने से मामला खत्म नहीं होता - उस पर विधिक कार्रवाई जारी रहती। पहले भी ऐसा हुआ है, जहां महाभियोग प्रस्ताव आने के बाद संबंधित न्यायाधीश ने इस्तीफा दे दिया और मामला वहीं थम गया, जबकि आरोप काफी गंभीर थे।
विदेशों में व्यवस्था । कई देशों में न्यायिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए कानून हैं। अमेरिका में जूडिशल काउंसिल रिफॉर्म्स एंड जूडिशल कंडक्ट एंड डिसेबिलिटी एक्ट, 1980 लागू है। जर्मनी में जजों के आचरण की निगरानी के लिए डिसीप्लिनरी कमिटी की व्यवस्था है। कनाडा में 1971 से जूडिशल काउंसिल काम कर रही है।
जनता का भरोसा । भारत में भी ऐसे किसी कानून की जरूरत है, क्योंकि महाभियोग की प्रक्रिया व्यवहारिक नहीं। यह इतनी जटिल है कि आज तक किसी जज को महाभियोग के जरिये नहीं हटाया जा सका। जब न्यायाधीशों को इतनी सुरक्षा दी गई, तब न्यायिक भ्रष्टाचार की कल्पना भी नहीं की गई थी। लेकिन, हाल के दशकों में न्यायिक भ्रष्टाचार के कई उदाहरण सामने आए हैं। न्यायपालिका पर जनता का भरोसा बना रहे, इसके लिए उसकी जवाबदेही पक्की करना जरूरी है। यह लोकतंत्र और न्यायपालिका, दोनों के हित में होगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)


