शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में हाल ही में नैशनल ऐक्सिलेंस अवॉर्ड से नवाजे गए वीणा वादक सलिल भट्ट ने गिटार को सात्विक वीणा का नया रूप दिया है। अपने पिता और गुरु पंडित विश्वमोहन भट्ट के साथ वह देश-विदेश में खूब जुगलबंदी करते हैं। साथ ही, स्वतंत्र रूप से भी कार्यक्रम करते रहे हैं। प्रस्तुत हैं आलोक पराड़कर से हुई उनकी विस्तृत बातचीत के खास अंश:
n पिता की ' मोहन वीणा ' और आपकी 'सात्विक वीणा' में क्या फर्क है?
पिता जी ने अपनी वैज्ञानिक सोच के कारण ही छह तार के पाश्चात्य वाद्य गिटार को अपनी 20 तारों वाली मोहन वीणा में बदलकर उसे सरोद, वीणा और सितार की ध्वनियों का संगम बना दिया। उन्होंने विश्व वीणा, हंस वीणा भी बनाई। हंस वीणा उन्होंने अपने गुरु प्रख्यात सितार वादक पंडित रविशंकर को भेंट की थी। मैंने 1998 में सात्विक वीणा बनाई और साल 2000 से इसे संगीत समारोहों में बजाने लगा। 2002 में तानसेन संगीत समारोह में इसका स्वतंत्र वादन किया। इसकी खास बात है कि इसमें मोहन वीणा या दूसरे ऐसे वाद्यों की तरह कोई जोड़ नहीं है यानी यह पूरी एक लकड़ी का बना है। जोड़ वाले वाद्यों के टूटने का खतरा अधिक होता है तो विचार था कि ऐसा वाद्य हो जिसमें कोई जोड़ न हो। अपने बेटे सात्विक के नाम पर मैंने यह नाम दिया है।
n पिता के साथ मंच साझा करने का आपका अनुभव कैसा होता है?
स्वतंत्र रूप से बजाने और उनके साथ बजाने में बड़ा फर्क है। स्वतंत्र प्रस्तुतियों में मैं पूरी तरह से स्वतंत्र होता हूं लेकिन जब मैं उनके साथ मंच पर बैठता हूं तो यह मेरे लिए सबसे बड़ी परीक्षा बन जाती है। एक अजीब द्वंद्वात्मक स्थिति में मैं खुद को पाता हूं। अगर मैं बढ़-चढ़कर बजाऊं, तो उनकी (मेरे गुरु भी वही हैं) डांट का डर रहता है। अगर न बजाऊं तो वे इस बात के लिए डांट सकते हैं कि मैंने जो इतना सिखाया है वह किस काम का है! उनके साथ बजाना युद्ध जीतने जैसा होता है।
n क्या जाने-माने कलाकार के पुत्र होने का दबाव भी आप महसूस करते हैं? क्या बचपन से ही कलाकार बनना चाहते थे?
परिवार की परंपरा और विरासत का दबाव मुझ पर हमेशा रहा। मैं महाकवि पद्माकर का वंशज हूं। मेरे पिता संगीतज्ञ पंडित मनमोहन भट्ट और राजस्थान की पहली महिला संगीत शिक्षक विदुषी चंद्रकला भट्ट की दसवीं और सबसे छोटी संतान हैं। चार बड़े भाइयों में से तीन भाई पंडित शशि मोहन सितार, पंडित रवि मोहन और पंडित महेंद्र भट्ट वायलिन के उच्च कोटि के कलाकार थे जबकि उनकी बड़ी बहन विदूषी मंजू मेहता प्रसिद्ध महिला सितार वादिका थीं। लेकिन मेरी रुचि शुरू में फिल्मों में थी पर गया मैं सेना में...। फिर फिल्मों में भी गया। लेकिन, फिर मन बदला और संगीत में आ गया। मेरे बेटे ने फिल्म निर्माण का प्रशिक्षण लिया है। मैं अपनी विरासत को आगे ले जाना चाहता हूं मगर कमतर रहने का डर बना रहता है।
n आपके नए अलबम की थीम क्या है?
यह पृथ्वी, जल, अग्नि, गगन और वायु से संगीत के रिश्ते पर आधारित है। प्रकृति से निकटता और संगीत के माध्यम से मैंने ध्यान और अध्यात्म की ओर जाने का प्रयास किया है।
n इधर आप अपने पिता के साथ संगीत प्रस्तुतियों में राजस्थान के प्रसिद्ध मंगनियार लोक कलाकारों को भी शामिल करते हैं। यह किस तरह का प्रयोग है?
चूंकि हम राजस्थान के रहने वाले हैं, तो मोहन वीणा और सात्विक वीणा के शास्त्रीय संगीत का मंगनियार कलाकारों के लोकसंगीत से जुड़ना अपनी जड़ों के प्रति आदर व्यक्त करने जैसा है। पश्चिमी राजस्थान में लंगा और मंगनियार गायन लोक संगीत का न सिर्फ एक लोकप्रिय रूप है बल्कि यह साम्प्रदायिक सद्भाव की संस्कृति का प्रतीक भी है। बुलंद आवाज में गहरे तक दिल को छूने वाली इनकी लोकधुनें, कठिन लयकारियों में रची होती हैं। इन लोकधुनों में कई शास्त्रीय रागों की झलक भी देखी जा सकती है। हम जब मांगनियार लोक कलाकारों-कुतले खान, थानू खान बरना, दारे खान-के साथ संगीत प्रस्तुतियां करते हैं, तो संगीतप्रेमियों का खूब प्यार भी मिलता है।
n कोई संगीत कार्यक्रम जो आपके लिए खास यादगार बन गया हो...?
पैंतालीस से अधिक देशों, 600 से अधिक शहरों में 2000 से अधिक प्रस्तुतियां दी हैं लेकिन जो कभी नहीं भूलता, वह याद पूर्व राष्ट्रपति और प्रसिद्ध वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम से जुड़ी है। वह मुझे अपने साथ जर्मनी की यात्रा पर ले गए थे। मैंने वहां की संसद में सात्विक वीणा बजाई। कार्यक्रम के बाद कलाम साहब मंच पर आए और सात्विक वीणा हाथ में लेकर गहरी दिलचस्पी के साथ देखने लगे। उन्होंने मेरी पीठ थपथपाई और कहा कि मैं भी थोड़ी बहुत वीणा बजाता हूं।


