n NBT रिपोर्ट, लखनऊ : परिवहन विभाग की सेवाओं को पूरी तरह ऑनलाइन करने का मकसद लोगों को सुविधा देना था, लेकिन चार साल बाद भी व्यवस्था आवेदकों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई है। 2022 में लर्निंग ड्राइविंग लाइसेंस सेवा को पूरी तरह ऑनलाइन किया गया था। इसके साथ ही आरटीओ अधिकारियों की भूमिका लगभग खत्म हो गई। हालांकि, एनआईसी अब तक सिस्टम को पूरी तरह यूजर फ्रेंडली नहीं बना सका है।
शिकायत का भी नहीं कोई प्लैटफॉर्म : ऑनलाइन प्रक्रिया में लगातार आ रही तकनीकी दिक्कतों के बावजूद आवेदकों को शिकायत दर्ज कराने के लिए कोई प्रभावी मंच नहीं दिया गया। ऑफलाइन विकल्प पूरी तरह बंद होने से लोगों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। वर्तमान में करीब 50 सेवाएं ऑनलाइन हो चुकी हैं, लेकिन तकनीकी जटिलताओं के कारण आम लोग सिस्टम के जाल में फंसकर आरटीओ के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
वाहन पोर्टल ठप, आवेदक परेशान :हाल ही में वाहन पोर्टल करीब एक सप्ताह तक प्रभावित रहा। लखनऊ समेत प्रदेश भर के हजारों आवेदक आरटीओ कार्यालयों के चक्कर लगाते रहे। अधिकारियों ने साफ कर दिया कि सर्वर और तकनीकी व्यवस्था एनआईसी के जिम्मे है। शासन तक शिकायत पहुंचने के बाद पता चला कि पोर्टल अपडेट किया जा रहा था। सवाल यह उठा कि इसकी पूर्व सूचना आवेदकों को क्यों नहीं दी गई। कई लोगों को समय और आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा।
ऑफलाइन विकल्प खत्म करना पड़ा भारी : जब ऑनलाइन व्यवस्था लागू की गई थी, तब विभाग के भीतर एक वर्ग ऑफलाइन विकल्प बनाए रखने के पक्ष में था। डिजिटल साक्षरता की कमी और इंटरनेट समस्याओं को लेकर कई तर्क दिए गए थे, लेकिन ऑनलाइन व्यवस्था के समर्थक अधिकारियों की राय भारी पड़ी। इसके बाद कई खामियां सामने आईं। यहां तक कि मृतकों के नाम पर भी लर्निंग लाइसेंस जारी होने के मामले सामने आए।
सुधार की कोशिश करने वालों पर दबाव
: सूत्रों के अनुसार कुछ अधिकारियों ने ऑनलाइन के साथ ऑफलाइन विकल्प बहाल करने की बात उठाई, लेकिन उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा। स्थिति यह है कि अब कई अधिकारी इस मुद्दे पर खुलकर बोलने से भी बचते हैं।
दलालों को मिला सबसे बड़ा फायदा: ऑनलाइन सिस्टम की जटिलताओं ने आरटीओ में दलालों के नेटवर्क को मजबूत कर दिया है। तकनीकी दिक्कतों से परेशान आवेदक मजबूरी में दलालों का सहारा ले रहे हैं। एनबीटी के स्टिंग में कई दलालों ने 350 रुपये की सरकारी फीस वाले लर्निंग लाइसेंस के लिए तीन से चार हजार रुपये तक वसूलने का दावा किया था। आरटीओ कार्यालयों के बाहर तेजी से बढ़ती ऑनलाइन फॉर्म भरने की दुकानों से भी साफ है कि आम लोग अब भी ऑनलाइन व्यवस्था को आसानी से इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं।

