आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने तीसरे और चौथे बच्चे के जन्म पर परिवारों को आर्थिक प्रोत्साहन देने की घोषणा की है। इस फैसले के पीछे सामाजिक और आर्थिक के साथ राजनीतिक वजहें भी हैं। हालांकि इसकी सफलता को लेकर शक है, क्योंकि दूसरी जगहों पर हुए ऐसे ही प्रयोग खास सफल नहीं रहे।
उत्तर बनाम दक्षिण । दुनिया के कई देश बूढ़ी होती आबादी और घटती जन्मदर से परेशान हैं। भारत में भी टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) 1.9 है, जबकि स्थिर जनसंख्या के लिए होना चाहिए 2.1 यानी हर कपल पर औसतन इतने बच्चे। दक्षिण भारत के राज्यों में प्रजनन दर राष्ट्रीय औसत से भी नीचे, 1.5-1.6 है, जबकि उत्तर में 2.5-3 के बीच। TFR में बैलेंस जनसंख्या संतुलन के लिए जरूरी है, वरना बच्चे कम पैदा होंगे और मौजूदा आबादी तेजी से बूढ़ी होती जाएगी। अनुमान है कि 2050 तक भारत की 20% आबादी बुजुर्ग श्रेणी में होगी। वहीं, आंध्र में यह औसत होगा 23%।
स्थिर आबादी जरूरी । अगर TFR बहुत कम हो जाए तो धीरे-धीरे युवाओं की संख्या घटने लगती है और बुजुर्ग आबादी बढ़ जाती है। इससे अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ता है, क्योंकि काम करने वाले लोग कम हो जाते हैं। दूसरी ओर, पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा पर खर्च बढ़ जाता है। आंध्र की चिंता राजनीतिक वजहों से भी है। दक्षिण के राज्यों को अंदेशा है कि परिसीमन में उनके यहां लोकसभा की सीटें उत्तर भारत के मुकाबले कम हो सकती हैं, क्योंकि उनकी आबादी कम है।
असफल रहे प्रयास । हालांकि आंध्र जो करने की कोशिश कर रहा है, उसे पहले भी आजमाया जा चुका है। देश में ही सिक्किम कम जन्मदर से परेशान है। यहां का TFR 2025-26 में महज 1.1 रहा, जबकि राज्य सरकार ने महिलाओं के इलाज, सरकारी कर्मचारियों को वेतन वृद्धि और आर्थिक प्रोत्साहन जैसी पहल की है। दक्षिण कोरिया, जापान भी फेल हुए, जबकि हंगरी को बेहद मामूली सफलता मिली। यह तरीका क्यों काम नहीं करता, इसे समझने का सबसे अच्छा उदाहरण चीन है, जिसने 34 साल वन चाइल्ड पॉलिसी अपनाई और अब छूट के बावजूद आम चीनी एक से ज्यादा बच्चे नहीं चाहते, क्योंकि पालन-पोषण महंगा हो चुका है।
शिक्षा का असर । आंध्र समेत दक्षिण के राज्यों ने भी बहुत मेहनत से जनसंख्या नियंत्रण नीति लागू की थी। वहां शिक्षा और जागरूकता पर बाकि राज्यों के मुकाबले ज्यादा खर्च किया गया। इसी सामाजिक निवेश की वजह से आज दक्षिण के राज्य आगे खड़े दिखते हैं। आबादी को बढ़ाने की नाकाम कोशिशों के बजाय मौजूदा कार्यबल के बेहतर इस्तेमाल पर ध्यान देना चाहिए।

