मृत्युंजय राय
फोर्टेसा लतीफी की किताब ‘Like, Follow, Subscribe: Influencer Kids and the Cost of a Childhood Online’ हमें चाइल्ड इन्फ्लुएंसर्स और फैमिली वीलॉगिंग की स्याह दुनिया में ले जाती है। लतीफी अमेरिकी पत्रकार हैं और उन्होंने इस विषय की पड़ताल के लिए इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग का प्रयोग किया है। वह लिखती हैं कि किस तरह से पैरंट्स, प्लैटफॉर्म्स (यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसे) और ऑडिएंस मिलकर बच्चों की निजी जिंदगी को ऐसे कॉन्टेंट में बदल रहे हैं, जिनसे पैसा बनाया जा सके।
लतीफी के किताब के केंद्र में ‘ क्रिएटर इकॉनमी ’ है, जिसके बारे में अमेरिकी बैंकिंग फर्म गोल्डमैन सैक्स का अनुमान है कि यह अगले साल तक अमेरिका में 480 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। इसकी ग्रोथ आने वाले वर्षों में 14-20% रहने का अनुमान है। लतीफी ने बताया है कि किस तरह से आम अमेरिकी परिवार पैसा कमाने की होड़ में शामिल होकर अपने बच्चों की जिंदगी तबाह कर रहे हैं। लेकिन यह सिर्फ अमेरिका की कहानी नहीं है। भारत सहित पूरी दुनिया में क्रिएटर इकॉनमी बड़ी हो रही है।
इस इकॉनमी के बदरंग पहलुओं को रीडर्स के सामने लाने के लिए लेखिका ने पहले चाइल्ड इन्फ्लुएंसर्स रह चुके लोगों के इंटरव्यू किए हैं। उन्होंने फैमिली वीलॉगर्स, साइकॉलजिस्ट और लेबर एक्सपर्ट्स से भी बातचीत की है। इसके जरिये उन्होंने यह समझाया है कि जब बच्चे की शरारतों, मेडिकल डाइग्नोसिस या टीनएजर्स के ब्रेक-अप को करोड़ों लोगों के लिए एंटरटेनमेंट मे बदला जाता है तो क्या होता है।
वह ऐसी मिसालें देती हैं, जिनमें अभिभावकों ने बच्चे से जुड़ी बहुत सेंसिटिव डिटेल्स को ऑडिएंस के सामने रखा। इनमें ब्रेस्ट फीडिंग, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े संघर्ष से लेकर साइकिएट्रिक डाइग्नोसिस जैसे कॉन्टेंट शामिल हैं। लेकिन पैसा कमाने के लालच में अंधे हो चुके पैरंट्स क्या कभी इन कॉन्टेंट के लिए बच्चों से मंजूरी लेते हैं। इन कॉन्टेंट्स की वजह से बाहर दोस्त, सहपाठी, अड़ोसी-पड़ोसी उनसे कैसा बर्ताव करेंगे, क्या वे इस बारे में कभी सोचते हैं? लतीफी लिखती हैं कि उन्हें कई ऐसे पैरंट्स मिले, जो बच्चों को क्रिएटर इकॉनमी के लिए एंप्लॉयी की तरह इस्तेमाल करते हैं।
लतीफी क्रिएटर इकॉनमी के फलने-फूलने के सामाजिक-आर्थिक कारणों से भी रीडर्स को वाकिफ कराती हैं। वह लिखती हैं कि अमेरिका में सोशल सिक्यॉरिटी न के बराबर है। चाइल्डकेयर सपोर्ट सिस्टम भी कमजोर है। इसलिए कई पैरंट्स अपने बच्चों से जुड़े कॉन्टेंट को वित्तीय स्थिरता के रूप में देखते हैं। लतीफी का कहना है कि इसकी एक वजह अमेरिका में रियल वेजेज (वास्तविक आय) में आई स्थिरता भी है। उन्होंने लिखा है कि पहले उन्हें ऐसी मां ब्लॉगर्स से हमदर्दी थी और इसी वजह से उनकी इस विषय में दिलचस्पी बढ़ी। फिर उन्होंने देखा कि कैसे ग्रोथ, स्पॉन्सरशिप डील्स और एल्गो से प्रभाव की वजह से बच्चों की देखरेख एक सुनियोजित परफॉरमेंस में बदली गई।
लतीफी ने ऐसे कॉन्टेंट के ऑडिएंस पर भी सवाल खड़े किए हैं। वह लिखती हैं कि किस तरह से उनके कैजुअल लाइक्स, सब्सक्राइब और कॉमेंट्स से एक ऐसी इंडस्ट्री को बढ़ावा मिल रहा है, जिसे बच्चों की सुरक्षा से जुड़े नियमों की परवाह नहीं है। लतीफी ने यह दिखाया है कि इस कल्चर के लिए किस तरह से पैरंट्स, प्लैटफॉर्म्स दोषी हैं और इसके लिए डिजिटल कंजम्पशन कल्चर भी कसूरवार है। आखिर कंजम्पशन के इस तरीके ने ही क्रिएटर इकॉनमी के बाजार को जन्म दिया है, जिसमें बच्चे तमाशा बनकर रहे हैं।

