बिहार के एक संपन्न जमींदार परिवार में जन्मे गणेश दत्त सिंह का पालन-पोषण बड़े लाड़-प्यार में हुआ। 19 वर्ष की आयु तक उन्होंने औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी। एक दिन पटना जाने पर उन्हें अर्जी लिखवाने में काफी परेशानी और अपमान का अनुभव हुआ। अर्जी लिखने वाले की बेरुखी ने उनके मन में आत्मसम्मान की ऐसी चिंगारी जगाई कि वह तुरंत घर लौट आए और उसी दिन से पढ़ना-लिखना शुरू कर दिया। अटूट मेहनत और लगन के बल पर उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और आगे चलकर वकालत की पढ़ाई पूरी की। शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए 1933 में पटना विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की, जबकि ब्रिटिश सरकार ने ‘सर’ की उपाधि से सम्मानित किया। 1923 से 1937 तक वह बिहार प्रांत की स्वायत्त सरकार में मंत्री रहे, लेकिन उनका जीवन सादगी और परोपकार का प्रतीक बना रहा। अपनी आय का बड़ा हिस्सा उन्होंने अनाथालयों, धर्मशालाओं और गरीब छात्रों की सहायता में दान कर दिया। यहां तक कि अपना निवास ‘कृष्ण कुंज’ भी उन्होंने पटना विश्वविद्यालय को समर्पित कर दिया। सर गणेश दत्त सिंह स्वतंत्रता से पहले बिहार और उड़ीसा में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए बहुत कुछ किया।

