इस बाज़ार को आपका पैसा नहीं, व़क्त चाहिए

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द्वारका सेक्टर-7 की सड़कों पर लगने वाला साप्ताहिक बाजार दिल्ली के अन्य इलाकों और देश के कई शहरों में भी लगता है। मॉल और ऑनलाइन शॉपिंग के दौर में भी ये बाजार अपनी रौनक बनाए हुए हैं। ये बाजार भारत की विविधता को दर्शाते हैं। यहां जरूरत की हर चीज मिलती है।

weekly markets where your time is more valuable than money

द्वारका सेक्टर-7 की ऊंची इमारतों वाली सोसायटी के पीछे की सड़क हफ्ते में एक दिन चहक उठती है। तब उसका कोना-कोना भर जाता है महक और आवाजों से। दिल्ली के तमाम इलाकों में ऐसा ही होता है, किसी एक दिन - सोम, मंगल, बुध या गुरु। और यही होता है नोएडा, गुड़गांव, लखनऊ और देश के दूसरे कई महानगरों में भी। मॉल, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स की विशालता और ऑनलाइन मार्केटिंग के बीच भी साप्ताहिक बाजार खुद को बचाए हुए हैं। और बचाए हुए हैं उस परंपरा को जिसने मेगस्थनीज से लेकर थॉमस रो, डोमिंगो पेस , निकोलो मनूची और वास्को दि गामा तक को चमत्कृत कर दिया था। इन विदेशी यात्रियों ने भारत की सड़कों पर लगे बाजारों में जो रौनक देखी, वह न रोम में थी और न फारस में।

15वीं सदी में फारस के शासक शाहरुख के राजदूत अब्दुर रज्जाक जब विजयनगर के राजा देव राय से मिलने पहुंचे तो वहां के बाजारों को देख हैरत में पड़ गए। उन्होंने लिखा है कि विजयनगर की सड़कों और गलियों के खुले बाजारों में सोने-चांदी के आभूषण बिकते थे। आज के साप्ताहिक बाजारों में भले खुले में हीरे-जवाहरात न बिकते हों, पर जो बिकता है वह भी कम लाजवाब नहीं। भारत की विविधता जैसे हैं ये बाजार। रंग-बिरंगे कपड़ों की चमक, खिलौनों की आवाज, मसालों की गमक, श्रृंगार का सामान - क्या नहीं मिलता यहां।

ये बाजार पुल हैं महानगरों में बसे भारत और इंडिया, शहर और गांव के बीच। सारी धाराएं आकर मिलती हैं यहां, या कहिए जरूरत खींच लाती है। जिन चीजों को लोग भुला बैठे हैं, वो अब भी मौजूद हैं यहां। इन बाजारों में कदम रखिए, तो कुछ न कुछ ऐसा दिख ही जाता है, जो कभी हर घर में हुआ करता था - दादी का सरौता, बाबा की चुनौटी, रसोई का खलबट्टा और कपड़े धोने वाली मुगरी। तसल्ली भी मिलती है इससे कि इन यादों को कहीं, किसी ने तो सहेज कर रखा है।

याद दिलाते हैं साप्ताहिक बाजार कि दुनिया आज भी बेहद सरल हो सकती है और जरूरतें जेब में समाने वाली। ये बाजार ख्याल रखते हैं उनका, जिनके पास कम है। इनमें सादगी है, पर भरपूर अपनापन। पैसे कम होना दिक्कत नहीं इनमें। हां, वक्त भरपूर होना चाहिए। यहां केवल खरीदारी के लिए नहीं, घूमने भी आते हैं लोग।

अतीत में उतरने, कुछ महसूस करने। महानगरों की गलियों-सड़कों, चौक-चौराहों पर एक दिन के लिए उगने और फिर उसी शहर में खो जाने वाले ये साप्ताहिक बाजार एहसास दिलाते हैं कि जीवन में खुशियां भी इसी तरह शामिल हैं। जरूरत है चमचमाते सुपर मार्केट से नजर नीचे जमीन पर लाने की।