अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में जब बयानों की कड़वाहट अचानक शहद में बदलने लगे, तो समझ जाना चाहिए कि पर्दे के पीछे कोई गहरी लाचारी छटपटा रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की हालिया पेइचिंग यात्रा को भी इसी चश्मे से देखा जाना चाहिए। ट्रंप कुछ दिन पहले तक तो चीन को भारी-भरकम टैरिफ और टेक-बैन के जरिए घेर रहे थे, और कहां आज 'ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल' में शी चिनफिंग के साथ साझा समृद्धि की भाषा बोलने लगे।
बदल गए बोल । चीन के खिलाफ बोलने में ट्रंप कभी पीछे नहीं रहे। उन्होंने पेइचिंग को इतिहास का सबसे बड़ा चोर तक कह रखा है। कोविड को वह खुलेआम 'चाइना वायरस' कहते रहे हैं। वहीं, चीन भी वैश्विक मंचों पर अकड़ने वाले रवैये का खुला प्रदर्शन करता रहा है। ताइवान के मुद्दे पर तो उसने अमेरिका को खुली चेतावनी दी है कि आग से मत खेलना। अब वही चीन 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' में ट्रंप के साथ चलने की बातें कर रहा है।
वॉशिंगटन में बेचैनी । इस हृदय परिवर्तन की हकीकत समझने के लिए हमें ट्रंप के रेड कारपेट वेलकम, CEOs की फौज और दो दिग्गजों की आपसी तारीफ से दूर जलते ईरान की ओर देखना होगा। आक्रमण के पहले ही दिन ईरान के शीर्षस्थ नेता को हटा देने के बाद ट्रंप और उनकी टीम ने सोचा था कि यह 'छोटा-सा अडवेंचर' जल्द ही खत्म हो जाएगा और एक सीमित सैन्य अभियान के जरिए वे विजेता बनकर उभरेंगे। लेकिन, ढाई महीने से ज्यादा हो गए, रस्साकशी जारी है और वॉशिंगटन की बेचैनी बढ़ती जा रही है।
साख पर संकट । अमेरिकी मतदाताओं की देशभक्ति अक्सर गैस स्टेशनों पर पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के सामने दम तोड़ देती है। सिर पर खड़े मिड-टर्म चुनावों, घरेलू महंगाई और वॉल स्ट्रीट पर छाई मायूसी ने ट्रंप को अहसास करा दिया है कि ईरान का यह दलदल उनकी राजनीतिक साख को लील सकता है।
मुश्किल में पेइचिंग । अब चीन को देखें, वेनेजुएला का क्रूड ऑयल अमेरिका ने वापस हथिया लिया। चीनी कुछ न कर सके, सिवाय रूस और खाड़ी से आयात करने के। फिर ईरान संकट ने उन्हें खाड़ी से भी काट दिया। महंगाई बढ़ने लगी। दुनिया की फैक्ट्री की प्रॉडक्शन कॉस्ट 25% से ज्यादा बढ़ गई, जबकि चीन की बुनियादी आर्थिक परिस्थितियां पहले से वेंटिलेटर पर हैं। आजकल चीन अभूतपूर्व युवा बेरोजगारी, रियल स्टेट संकट और विदेशी पूंजी के पलायन से जूझ रहा है।
सैलरी तक नहीं । चीन की Competitive Mayoral Economy में स्थानीय सरकारों ने अपने-अपने शहरों में विकास की होड़ दिखाने के लिए अंधाधुंध कर्ज लेकर बुनियादी ढांचे खड़े किए। लेकिन, आज उनसे कोई कमाई नहीं हो रही। स्थिति यह है कि कई चीनी शहरों में सरकारी कर्मचारियों को वेतन देने तक के लिए पैसे नहीं हैं।
अकड़ पड़ी ढीली । ईरान की पहेली सुलझाना अमेरिका और चीन, दोनों के लिए जरूरी है। दोनों को एक-दूसरे में सहारा मिल रहा है। यही वह मोड़ है, जहां इन दोनों महाशक्तियों की अकड़ उनके आर्थिक अस्तित्व के सामने घुटने टेक देती है। ट्रंप की पेइचिंग यात्रा ताकत की नुमाइश नहीं, लहूलुहान हो चुके दो पहलवानों का एक-दूसरे को सहारा देने का समझौता है।
एक-दूसरे पर निर्भरता । ट्रंप जान गए हैं कि चुनावी भाषणों में चीन को कोसना जितना आसान है, व्यावहारिक धरातल पर उसकी फैक्ट्रियों के बिना जीना उतना ही असंभव। अमेरिका भले ही AI और एनविडिया जैसी अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर चिप्स के क्षेत्र में दुनिया का सिरमौर होने का दावा करे, लेकिन इन तकनीकों और अगली पीढ़ी के हथियारों को बनाने के लिए सबसे जरूरी 'रेयर अर्थ मिनरल्स' की चाबी आज भी चीन के पास है।
दोनों का नुकसान । यह अमेरिकी बाजार की वह विवशता है, जो मानती है कि इनोवेशन भले ही कैलिफोर्निया में हो, लेकिन उसे हकीकत में बदलने वाला मैन्युफैक्चरिंग इंजन आज भी चीन ही रहेगा। दोनों एक-दूसरे की रीढ़ तोड़ना चाहते हैं, लेकिन यह भी जानते हैं कि अगर वैश्विक आर्थिक ताना-बाना पूरी तरह बिखरा, तो मलबे के नीचे दोनों ही दफन होंगे।
रास्ता बदले भारत । ट्रंप और चिनफिंग की बनावटी मुस्कान सबूत है कि राजनीति व कूटनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता, न नफरत और न ही प्रेम। यहां बस अंतहीन संघर्ष चलता है सत्ता बचाने का। अगर भारत इस उम्मीद में था कि चीन-अमेरिका तनाव से उसे 'चाइना प्लस वन' रणनीति के तहत ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनने का बड़ा अवसर मिलेगा, तो हमें अपनी रणनीति को नए सिरे से और बहुत तेजी से री-कैलिब्रेट करना होगा।
(लेखक फिल्मकार, कॉलमनिस्ट और राइटर हैं)

