बशीर बद्र ने दिया लड़ने का हौसला

Contributed byशीतल वर्मा|नवभारतटाइम्स.कॉम

लेखक ने 1990 के दशक की गर्मियों को याद किया। उस समय जगजीत सिंह और चित्रा सिंह का एल्बम 'Someone Somewhere' उनके परिवार में आया। लेखक ने मजबूरी में गजलें सुनीं। बशीर बद्र के शब्दों ने उन्हें मुश्किलों से लड़ने की प्रेरणा दी। बद्र साहब की गजलों ने युवाओं को अपना दर्द बयां करते हुए महसूस कराया।

bashir badrs ghazals gave courage to fight lifes difficulties

1990 की गर्मियों की वो शाम... बनारस में किराए के दो कमरों में सिमटा हमारा परिवार। शाम को पापा जब ऑफिस से लौटे, तो उनके हाथ में चमचमाता हुआ नया कैसेट टेपरिकॉर्डर था। उस वक्त हमारे पास सिर्फ एक ही कैसेट था, जगजीत सिंह और चित्रा सिंह का उसी दौरान रिलीज हुआ नया एल्बम ‘Someone Somewhere’। मैं उन दिनों फाइन आर्ट्स के थर्ड ईयर का स्टूडेंट था। वह दौर था ब्लैक एंड वाइट पोर्टेबल टीवी का, इसलिए अपनी हैसियत के हिसाब से वह टेपरिकॉर्डर भी हमारे लिए किसी महंगे गैजेट से कम नहीं था।

शुरुआत में मैं बहुत खुश था कि अब अपना मनपसंद म्यूजिक सुन सकूंगा, पर जब देखा कि पापा गजल का कैसेट ले आए हैं, तो थोड़ा अजीब लगा। हालांकि, जगजीत सिंह तब तक ‘होठों से छू लो तुम’ गाकर एक बेहतरीन सिंगर के रूप में अपनी पहचान बना चुके थे। बहरहाल, हमारे पास और कोई चारा नहीं था। एक तो वैसे ही पैसों की तंगी थी, ऊपर से घर का माहौल कुछ अलग-सा था और उसमें यह ‘सैड’ गजल एल्बम! मजबूरी में मैं रोज, कई दिनों तक लगातार उसी पूरे कैसेट को सुनता रहा, जब तक कि कुछ पैसे जमा करके दूसरा कैसेट नहीं खरीद लिया गया। लेकिन, बार-बार सुनने की इसी मजबूरी ने मेरे भीतर एक बड़ा बदलाव किया। उस कठिन दौर के हालातों से लड़ने का जो जज्बा मुझे इन गजलों से मिला, उसमें बशीर बद्र साहब के लिखे शब्दों ने एक अद्भुत भूमिका निभाई। मैंने बशीर बद्र साहब की जो पहली गजल सुनी, वह भी दूरदर्शन पर चंदन दास की आवाज में थी, ‘न जी भर के देखा न कुछ बात की, बड़ी आरजू थी मुलाकात की’। लेकिन इसके बाद जगजीत सिंह की आवाज में बशीर बद्र की गजलों को सुनना मेरे लिए एक बेहद शानदार और अनोखा अहसास बन गया, जो आज भी वैसा ही है।

हम कलाकारों की विज़ुअलाइजेशन की अपनी दुनिया होती है। बद्र साहब के शब्द हमारी क्रिएटिविटी और सोचने-समझने की क्षमता के लिए खाद-पानी का काम करते थे। आर्टवर्क बनाते वक्त अक्सर मेरी कमर में वॉकमैन खोंसा रहता था और उसमें गजलें बजती रहतीं। एग्जाम की तैयारी हो, भविष्य के सुनहरे सपने, इंटरव्यू की घबराहट हो, रिजेक्शन का डर, इश्क में मिली नाकामी हो या फिर सामाजिक और आर्थिक विषमताएं - हम युवाओं को अपनी हर बात में बशीर बद्र अपना-सा दर्द बयां करते मालूम होते थे। उनसे एक गहरा निजी जुड़ाव महसूस होता था। सच कहूं तो उस दौर में जगजीत सिंह और बशीर बद्र की इस जुगलबंदी ने हम जैसे न जाने कितने लोगों के लिए एक ‘इन्विजिबल काउंसलर’ का काम किया।