दौड़ से प्यार शुरू होने की पापा हैं प्रेरणा

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गुरिंदरवीर सिंह ने 100 मीटर रेस में 10.09 सेकंड का समय निकालकर भारतीय स्प्रिंटिंग में नया इतिहास रचा है। वह अपनी सफलता का श्रेय अपने पिता को देते हैं। गुरिंदरवीर सिंह ने बताया कि वह रेस से पहले खुद को डिस्ट्रैक्ट रखते हैं और 'वार' सुनकर खुद को मोटिवेट करते हैं।

gurinderveer singh the inspiration and journey of the indian sprinter who created history in the 100m race

100 मीटर रेस का जिक्र होने पर हम भारतीयों की जुबां पर सबसे पहले गुरिंदरवीर सिंह का नाम आता है। रांची में आयोजित फेडरेशन कप के दौरान गुरिंदरवीर ने 10.09 सेकंड की दौड़ लगाकर इतिहास रच दिया। भारतीय स्प्रिंटिंग में नई रोशनी जगाने वाले गुरिंदरवीर सिंह से रूपेश रंजन सिंह ने लंबी और दिलचस्प बातचीत की। खास अंश:

n IPL सीजन में लोग क्रिकेटर को छोड़कर आपके बारे में पढ़ रहे हैं, जान रहे हैं। क्या आपने सोशल मीडिया पर देखा कि लोग आपके बारे में क्या लिख रहे हैं?

ऐसा नहीं है कि मैंने कुछ देखा ही नहीं, लेकिन मैं उसमें ज्यादा डूबना नहीं चाहता। मुझे पता है कि लोग बहुत प्यार दे रहे हैं, गर्व महसूस कर रहे हैं। सबसे अच्छी बात यह लगती है कि एक आम इंसान भी मेरी रेस से खुद को जोड़ पा रहा है। लेकिन मेरी कोशिश यही है कि मैं ज्यादा इन्वॉल्व न हो जाऊं। मैंने लिखा भी था- ‘Task is not finished yet.’ यानी काम अभी पूरा नहीं हुआ है। अभी तो सफर आधा ही तय हुआ है।

n इतनी तारीफ और सफलता के बाद क्या दबाव महसूस होने लगता है?

मैंने कहीं पढ़ा था कि अगर आप ‘कुछ नहीं’ होते हैं, तो आपको डर नहीं लगता। तो मैं ये रेकॉर्ड, ये मेडल सब भूल कर फिर से वही गुरिंदर बनना चाहता हूं जो ‘कुछ नहीं’ था। जब मेरे पास कुछ नहीं होगा तो हारने का भी डर नहीं होगा। ऐसा करने पर ही मैं दबावमुक्त होकर और बेहतर कर पाऊंगा।

n ऐथटेलिक्स में 100 मीटर रेस को सबसे ज्यादा प्रेशर वाला इवेंट माना जाता है। आप रेस से पहले दबावमुक्त रहने या अपने भीतर ऊर्जा भरने के लिए क्या खास करते हैं?

रेस से पहले मैं खुद को जितना हो सके, उतना डिस्ट्रैक्ट रखने की कोशिश करता हूं। मैं इवेंट के बारे में जरूरत से ज्यादा सोचने से बचता हूं, क्योंकि उसकी तैयारी हम पहले ही कर चुके होते हैं। लेकिन जब मैं कॉम्पिटिशन मोड में पहुंचता हूं, तब खुद को मोटिवेट करने के लिए ‘वार’ सुनता हूं। हमारे इलाके में पुराने समय में जंग पर जाने से पहले ऐसे बोल गाए जाते थे। मेरे लिए 100 मीटर सिर्फ रेस नहीं है, यह एक जंग का एहसास है, वही जंग, जिससे कभी मेरे पुरखे गुजरे होंगे।

n शायद इसी वजह से ट्रैक पर गुरिंदर बहुत जज्बाती नजर आते हैं?

हो सकता है। ट्रैक पर मैं पूरी तरह बदल जाता हूं। लेकिन ट्रैक के बाहर मेरी पर्सनैलिटी अलग है। मैं काफी कूल हूं, फनी हूं, दोस्तों के साथ हंसी-मजाक में रहता हूं। लेकिन जैसे ही वो ‘वार’ सुनता हूं, मेरी पर्सनैलिटी बदल जाती है।

n अपने परिवार और बैकग्राउंड के बारे में कुछ बताइए। स्प्रिंट में कैसे आना हुआ?

मेरे परिवार में खेल का माहौल था। मेरे पिता वॉलीबॉल खेलते थे, दादा कबड्डी खेला करते थे और घर में मेडल, फोटो और ट्रोफियां रहती थीं। मुझे ट्रोफियां साफ करने में अच्छा लगता था। मैं पापा से पूछता भी रहता था कि यह कहां जीते, वह कहां जीते। शायद वहीं से मेरे अंदर खेल के प्रति मोहब्बत पैदा हुई। तब मुझे भी लगता था कि मैं भी एक दिन खेलूंगा और जीतूंगा। स्प्रिंट के प्रति मेरा प्यार पापा के साथ मॉर्निंग वॉक से ही शुरू हुआ। पापा मुझे सुबह अपने साथ ले जाते थे और मजाक-मजाक में तेज भगाते थे। मुझे भी तेज भागने में अलग खुशी महसूस होती थी।

n कहा जाता है कि भारत में क्रिकेटर्स की वजह से दूसरे खेलों के खिलाड़ियों को खास महत्व नहीं मिलता। आप क्या सोचते हैं?

मुझे लगता कि क्रिकेट किसी दूसरे खेल का रास्ता रोकता है। असली बात यह है कि आपको कुछ ऐसा करना पड़ता है कि लोग खुद आपको देखने लगें। आज नीरज चोपड़ा का नाम हर बच्चा जानता है। मनु भाकर को पूरा देश पहचानता है। मिल्खा सिंह जी के समय भी क्रिकेट था। अगर आप देश के लिए बड़ा हासिल करते हैं तो लोग आपको जरूर प्यार देते हैं। आपको बस ऐसा काम करना होता है कि लोग आपको नजरअंदाज न कर सकें। आप वैभव सूर्यवंशी को ही देख लीजिए। क्रिकेट तो कई लोग खेल रहे हैं, लेकिन चर्चा सूर्यवंशी पर ही हो रही है। यानी खेल कोई भी हो, मायने प्रदर्शन ही रखता है। इसलिए मुझे लगता है कि शिकायत से ज्यादा जरूरी प्रदर्शन है।

n रिलायंस फाउंडेशन यूथ स्पोर्ट्स का करियर में क्या योगदान रहा ?

मैं जिस माहौल से आया हूं, वहां सुविधाएं सीमित थीं। पंजाब में हमारा ट्रैक काफी खराब था। न कोई अच्छा डाइटीशियन था, न फिजियो और न ही बढ़िया जिम। रिलायंस से जुड़ने के बाद सब बदल गया। यहां बेहतर ट्रेनिंग मिली, अच्छी सुविधाएं मिलीं, सही रिकवरी मिली। सबसे बड़ी बात, जेम्स हिलियर जैसे कोच मिले। यहां आने के बाद ही मैं एक सही मायनों में प्रोफेशनल रनर बन पाया।