अदालती फैसलों में होने वाली देरी को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देश अहम हैं। इससे हाईकोर्ट में लंबित मुकदमों का बोझ कम होगा और न्याय तेजी से मिलेगा।
प्रक्रिया तेज होगी । चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुआई वाली बेंच ने सभी हाईकोर्ट को निर्देश दिया है कि आदेश सुरक्षित रखने के बाद तीन महीने के भीतर फैसला सुना दिया जाए। इसी तरह, जमानत अर्जियों पर उसी दिन आदेश सुनाया जाना चाहिए और अगर फैसला सुरक्षित रखा भी जाता है, तो वह अगले दिन सुना दिया जाए। सभी जजमेंट 24 घंटे के भीतर हाईकोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड करने का भी निर्देश दिया।
विशेष अवसर । सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए ये निर्देश दिए हैं। यह आर्टिकल पूर्ण न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट को व्यापक विवेकाधीन शक्ति देता है। यूं तो इसका इस्तेमाल विरले मौकों पर किया जाता है। लेकिन इस मामले में अनुच्छेद का उपयोग बताता है कि फैसलों में देरी किस तरह न्याय व्यवस्था को नुकसान पहुंचा रही है।
समय पर हों फैसले । भारतीय अदालतों पर सबसे बड़ा आरोप यही रहा है कि यहां मुकदमे बरसों-बरस चलते रहते हैं और कई बार फैसला इतनी देरी से आता है कि उसका प्रभाव महसूस नहीं होता। ऐसे में ताजा निर्देश व्यवस्था को समयबद्ध बनाने की कोशिश है।
पुरानी चिंता । पिछले साल मई में भी सुप्रीम कोर्ट ने हैरानी जताई थी कि झारखंड हाईकोर्ट ने 67 आपराधिक अपीलों में फैसला सुरक्षित रखा है। उस समय जो दो जजों की बेंच मामले को देख रही थी, उसमें जस्टिस सूर्यकांत भी थे। अदालत ने इस घटनाक्रम को चिंताजनक बताते हुए सभी हाईकोर्ट से लंबित फैसलों की जानकारी मांगी थी और कहा था कि वह कुछ अनिवार्य दिशा-निर्देश तैयार करेगी।
आजादी सबसे अहम । इसमें जमानत का मामला बेहद संवेदनशील है। सुप्रीम कोर्ट कई मौकों पर स्पष्ट कर चुका है कि संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत मिला गरिमापूर्ण जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सबसे महत्वपूर्ण है। ऐसे में यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि अदालत से तो जमानत मिल जाए या सजा लंबित हो जाए, लेकिन बाकी औपचारिकताओं की वजह से देरी हो। सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देशों से जल्द इंसाफ मिलने की उम्मीद बंधी है। अगर ऐसा हुआ तो इससे न्यायपालिका पर भरोसा बढ़ेगा।

