आज्ञाकारी पत्नी नहीं, गैंगस्टर बनना चुनूंगी

नवभारतटाइम्स.कॉम•
arundhati roys new memoir my mother my gangster a sharp attack on patriarchy and stereotypes
बुकर पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध लेखिका अरुंधति रॉय का नया संस्मरण ' मेरी मां मेरी गैंगस्टर ' इन दिनों साहित्यिक हलकों में गहरे वैचारिक विमर्श का केंद्र बना है। पितृसत्ता , सामाजिक रूढ़ियों और स्त्री-अधिकारों की पृष्ठभूमि पर लिखी इस किताब के विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक पहलुओं पर नाइश हसन ने अरुंधति रॉय से बातचीत की।

आपकी किताब का शीर्षक है 'मेरी मां मेरी गैंगस्टर'। एक मां के लिए 'गैंगस्टर' जैसा शब्द चुनना पाठकों को झकझोरता है। मैरी रॉय को गैंगस्टर कहने की क्या वजह है?
मुझे पता है कि किताब के शीर्षक ने बहस को जन्म दिया है। शायद यह कुछ-कुछ वैसा ही है, जिसे हमारे प्रधानमंत्री 'कल्चर शॉक' कहते हैं। इस किताब के पहले अध्याय का नाम ही 'गैंगस्टर' है। इसमें बताया गया है कि कैसे मिसेज रॉय ने उस बेहद दकियानूस, दूसरों को आंकने वाले और छोटे से रूढ़िवादी शहर में एक गैंगस्टर वाली धार के साथ अपनी जिंदगी बनाई। यह स्नेह और अपनापन से भरा शब्द है, जिसे तंज के तौर पर इस्तेमाल किया गया है।

n केरल के सीरियन क्रिश्चियन समाज के खिलाफ पैतृक संपत्ति में औरतों के समान अधिकार के लिए लड़ी गई आपकी मां की कानूनी लड़ाई ने आपके सामाजिक नजरिए और बागी तेवर को कितना प्रभावित किया?

इन चीजों को समझना मुश्किल होता है। मुझे लगता है कि मैंने इस सच को आत्मसात कर लिया था कि आपको चीजों को सिर्फ इसलिए स्वीकार नहीं कर लेना है कि वे जैसी हैं वैसी रहेंगी। चूंकि मेरे अपने समाज की इन परंपराओं और रूढ़ियों ने मेरे लिए कोई दिलासा नहीं छोड़ी थी और न ही मेरी मां ने कोई दिलासा दी थी। हां, प्रेरणा मिली लेकिन सुकून या दिलासा बिल्कुल नहीं, इसलिए मैंने उस किनारे से दूर जाने का फैसला किया।

n आपने मां की पारंपरिक छवि से हटकर उन्हें उनकी खूबियों और खामियों के साथ पेश किया है। क्या आपको डर था कि रूढ़िवादी समाज इसे स्वीकार नहीं करेगा?

मैं जब लिखती हूं तो कभी यह नहीं सोचती कि समाज इसकी मंजूरी देगा या नहीं। लेकिन, मुझे लगता है कि मेरी मां अपनी रोशनी के साथ-साथ अपने अंधेरे के लिए भी इतिहास और साहित्य के पन्नों में दर्ज होने की हकदार थीं। उन्होंने इस धारणा से आजाद रखा कि हमें हमेशा लचीला, आज्ञाकारी और अच्छा ही बने रहना चाहिए।

n अगर मैरी रॉय भी आम मां की तरह होतीं, तो क्या आज दुनिया ‘गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ की अरुंधति रॉय को देख पाती?

मैं ऐसी लेखिका हूं जो अपनी मां के गुस्से और उनकी सूझबूझ से पैदा हुई। उनका समाज के खिलाफ वह गुस्सा और खुद मेरे खिलाफ भी वही आक्रोश। लेकिन साथ ही उनके उस अनकहे, अव्यक्त प्रेम ने भी मुझे गढ़ा है और पढ़ने के उस तोहफे ने भी, जो उन्होंने मुझे तब दिया था जब मैं बहुत छोटी थी।

n आज भी अपनी शर्तों पर जीने वाली औरत को ‘विद्रोही’ या ‘गैंगस्टर’ कहा जाता है।

समाज विकसित हो रहा है। भारत एक ऐसा देश है जो एक साथ कई सदियों में जीता है। यहां कन्या भ्रूण हत्या और शिशु हत्या भी है, और दुनिया की सबसे उग्र, आजाद खयाल औरतें भी। कुछ औरतों ने अपनी आजादी के लिए लड़कर रास्ता बनाया है। कुछ वैसी औरतें भी हैं, जो अवसरों के साथ पैदा तो हुईं, पर घरेलू दायरे में सिमट गईं। हमें इसकी चिंता नहीं होनी चाहिए कि क्या ठप्पा लगाया जा रहा है, बल्कि फिक्र इस बात की हो कि हम क्या बनना चाहते हैं। मैं हमेशा आज्ञाकारी पत्नी बनने के बजाय गैंगस्टर बनना चुनूंगी।

n आपकी किताबों में हाशिये पर खड़े लोगों के प्रति सरोकार दिखता है। आज के दौर में हाशिये का सच लिखने के लिए लेखक को कैसा साहस चाहिए?

इस किताब में लिखा है कि कैसे एक रात मैंने देखा कि मां मेरे भाई को तब तक पीटती रहीं, जब तक लकड़ी का रूलर टूट नहीं गया। वह सिर्फ उसके कम अंक आने से नाराज थीं। अगली सुबह उन्होंने मुझे मेरे 'शानदार' रिपोर्ट कार्ड के लिए बधाई दी। इस बात ने मुझे खुद के प्रति शर्मिंदगी से भर दिया। उस दिन से मैंने हमेशा महसूस किया कि जब भी मेरे लिए कहीं तालियां बजती हैं, तो ठीक उसी पल कहीं कोई खामोश व्यक्ति पिट रहा होता है।

n क्या वैचारिक असहमति को आज के दौर में लोकतांत्रिक अधिकार के बजाय एक अपराध की तरह पेश करने की कोशिशें बढ़ी हैं?

यह स्थिति लंबे समय से बनी है। लेकिन, अब हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां एक राजनीतिक दल खुद को सरकार समझने की भूल कर बैठता है। नागरिकों को अपराधी ठहराया जा रहा है और उनके वोट देने का अधिकार तक छीना जा रहा है, इसलिए नहीं कि वे असहमत हैं, बल्कि वे कौन हैं। उनका धर्म, उनकी जाति और उनका लिंग यह तय करता है कि कानून और सरकार उनके साथ कैसा बर्ताव करेगा।