उस कमरे में छिपी कहानी

Contributed by: सैयद परवेज़|नवभारतटाइम्स.कॉम•
murder displacement and a fathers struggle for justice the story hidden in that room
रेलवे लाइन के किनारे एक कब्रिस्तान में मिट्टी देने गया था। उस मय्यत में 15 लोग ही पहुंचे थे। चूंकि उस दिन दोपहर से जो बारिश शुरू हुई, करीब शाम छह बजे जाकर थमी। बुजुर्ग महिला की मिट्टी हुई, वहीं दायीं ओर एक ताजा कब्र पर लिखा था- शहजाद, जन्म-2000, मृत्यु-2026। एक रिक्शे वाला जो मुझे अक्सर पास में दिखाई देता था, उसी ने बताया कि शहजाद उसी का बेटा था और किसी ने उसकी हत्या कर दी। मैं उसके कमरे पर पहुंचा, जहां एक स्लैब ही उसकी रसोई थी और बगल में छोटा-सा बाथरूम।

घर में नाम मात्र का सामान। लेकिन, कमरे में छोटे-छोटे गैलनों में पानी भरे रखे हुए थे। कमरे में उसका छोटा बेटा मोबाइल चला रहा था। मैंने पूछा, ‘क्या करते हो?’ उसने कहा, ‘काम सीख रहा था, लेकिन अब छोड़ दिया है।’ ‘तुम पढ़ाई नहीं करते?’‘सातवीं के बाद छोड़ दी। लॉकडाउन हो गया था। पापा के पास फीस देने के लिए पैसे ही नहीं थे।’ मैंने पूछा, ‘सरकारी स्कूल में क्यों नहीं गए?’ ‘सरकारी स्कूल वाले प्राइवेट स्कूल की टीसी मांग रहे थे। इसी में वक्त बीत गया और फिर पढ़ना नहीं हो पाया।’
उसकी बात सुनकर मैं कुछ देर चुप रहा। कैसे एक बच्चे की पढ़ाई सिर्फ इसलिए छूट जाती है क्योंकि उसके पिता के पास फीस देने के पैसे नहीं होते। मैंने रिक्शे वाले से पूछा, ‘आप कहां के रहने वाले हैं?’ ‘पूर्णिया, लेकिन हम लोग मूल रूप से मुंगेर के रहने वाले थे।’ उसने बताया कि बहुत पहले मुंगेर में दंगे हुए थे। तब उसके पिता परिवार के साथ पूर्णिया चले गए और वहीं पर उसका जन्म हुआ। उस समय बड़ी संख्या में मुस्लिम विस्थापन हुआ था। जो लोग गए, फिर कभी लौट न सके। दशकों बाद वापस लौटना आसान नहीं होता। पीड़ित परिवारों में असुरक्षा का भाव बना रहता है। ऊपर से उनके घर पर कब्जा हो गया था।

पूर्णिया से यह परिवार दिल्ली आया, कुछ दिन जामा मस्जिद के पास रहा। पिछले तीन दशकों से इसका ठिकाना बदरपुर था। रिक्शा वाला अब बुजुर्ग हो चला है। जिस बेटे की मौत हुई, वह भी ड्राइवर था और परिवार का सहारा बन रहा था। पिता का आरोप था कि पुलिस कार्रवाई नहीं कर रही। आला अधिकारियों को उसने पत्र लिखा है। उस कमरे में बैठकर मुझे महसूस हुआ कि उस पिता के लिए न्याय की डगर कितनी लंबी और कठिन है।

और तब मुझे अहसास हुआ कि हमारे आसपास से गुजरते लोग केवल राहगीर नहीं होते। उनके भीतर भी एक इतिहास भी होता है। हम उन्हें देखते हैं, लेकिन जानते नहीं। और जब तक जान पाते हैं, तब तक शायद बहुत देर हो चुकी होती है।