Risky Insurance Sales The Commission Game And Customer Losses
बीमे की रिस्की बिक्री
नवभारतटाइम्स.कॉम•
हमारे देश में बीमा कम ही लोगों के पास है। वो भी तब, जब बीमा बेचने के लिए एजेंटों को भारी-भरकम कमीशन राशि दी जाती है। ज्यादा कमीशन से बीमा का विस्तार होना चाहिए था, लेकिन हुआ उलट है। गलत तरीके से पॉलिसियां बेच दी जाती है। इससे ग्राहकों के पॉलिसी छोड़ देने की दर बढ़ रही है। बीमा कंपनियां इससे परेशान नहीं हैं। वे संपन्न ग्राहकों से ज्यादा कमाई करने में लगी हुई हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक वितरकों को दिए जाने वाले भुगतान, बीमा प्रीमियम की वृद्धि की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़े हैं। पहले साल का जो भी प्रीमियम होता है, उसका बहुत बड़ा हिस्सा कमीशन में चला जाता है। इस कमीशन का फायदा उठाने में बैंक भी जुटे हुए हैं। वहां हिस्सा और बढ़ जाता है।
आज की व्यवस्था में बीमा वितरक के लिए पुराने ग्राहक को बनाए रखना आकर्षक सौदा नहीं है। नया ग्राहक जोड़ने पर उसे कई गुना अधिक भुगतान मिलता है। इससे नई पॉलिसी बेचने पर अधिक जोर रहता है, जबकि पॉलिसी को सक्रिय बनाए रखना प्राथमिकता नहीं बन पाता। बीमा कंपनियां नए बाजार बनाने, पर्याप्त बीमा सुरक्षा देने पर ध्यान नहीं दे रही हैं। बीमा रेगुलेटर IRDAI ने 2023 में कमीशन की अधिकतम सीमा हटा दी थी। इसकी जगह प्रबंधन खर्च का मॉडल लाया गया। इसके बाद समस्या और गंभीर हो गई। अब IRDAI ही बदलाव के नए प्रस्ताव लेकर आया है। इसके अनुसार जीवन बीमा कंपनियों के लिए खर्च सीमा अगले पांच वर्षों में धीरे-धीरे घटाई जाएगी। इसमें लाइफ इंश्योरेंस के लिए प्रबंधन खर्च 12.5 फीसदी, जबकि जनरल इंश्योरेंस के लिए 20 फीसदी करने का प्लान है। ये लिमिट अब भी ज्यादा है। इसे लागू करने की समयसीमा भी कुछ लंबी है। पॉलिसीधारकों को इसका कितना लाभ मिलेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां इन खर्चों में कमी का उपयोग अपने मार्जिन बढ़ाने में करती हैं या ग्राहकों तक पहुंचाती हैं।बीमा इंडस्ट्री का तर्क है कि IRDAI का मुख्य काम ग्राहकों के हितों की रक्षा करना है। यह सुनिश्चित करना भी है कि कंपनियां नियमों का पालन करें। लेकिन रोजमर्रा के कारोबारी फैसले कंपनी को ही तय करने देना चाहिए। एजेंटों का नेटवर्क बनाना या कर्मचारियों को प्रोत्साहन देना उनका हक है। सबसे आम तर्क यह दिया जाता रहा कि उपभोक्ताओं को खुद जांच-पड़ताल करनी चाहिए और यदि उन्होंने गलत पॉलिसी खरीदी तो दोष उनका है। लेकिन यह नजरिया उचित नहीं है। यह स्वाभाविक है कि उद्योग बदलावों का विरोध करेगा। जिन लाखों पॉलिसीधारकों को वर्षों से नुकसान उठाना पड़ा है, उनके हित कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। बीमा उद्योग को यह समझना होगा कि यदि किसी कंपनी की आय पॉलिसीधारकों के नुकसान पर टिका है, तो वह मॉडल टिकाऊ नहीं है।
आगे चलकर यदि कमीशन बहुत कम कर दिए गए, तो कम प्रीमियम वाली पॉलिसियां वितरकों के लिए आकर्षक नहीं रहेंगी। ऐसे में वे केवल संपन्न ग्राहकों पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। इस मामले में केवल नियम बनाना ही काफी नहीं है, उनका असरदार पालन और निगरानी भी उतनी ही जरूरी है। सभी बीमा कंपनियों का लागत का ऑडिट होना चाहिए। जो कंपनियां नियमों का पालन नहीं करें, उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। ऐसे मामलों में नई पॉलिसियां जारी करने पर अस्थायी रोक जैसे दंड दिए जा सकते हैं। म्यूचुअल फंड उद्योग का अनुभव भी उम्मीद जगाता है। पिछले वर्षों में खर्चों पर लाए गए नियमों ने इंडस्ट्री के विकास को बाधित नहीं किया। बीमा सेक्टर को भी केवल भरमा कर पॉलिसी बेचने के मॉडल पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उपभोक्ता जागरूकता और भरोसे को मजबूत करने पर काम करना होगा। बीमा क्षेत्र में सुधार की शुरुआत लागत घटाने से हो सकती है, लेकिन अंतिम लक्ष्य अधिक पारदर्शी व्यवस्था बनाना होना चाहिए।