न्यू नॉर्मल

नवभारतटाइम्स.कॉम•
new normal when the value of the rupee decreased and the game of words increased
सुधर्मा घर लौटीं तो मुंह लाल था। सुखनंदन ने ड्राइवर को डांटा, ‘कहां गायब थे, मैडम को धूप में पैदल चलना पड़ा।’ ड्राइवर के बोल फूटने से पहले सुधर्मा फट पड़ीं, ‘धूप से नहीं जले हैं, बाजार में आग लगी है। आदमी की तो पहले ही कीमत नहीं थी, अब रुपये की भी कीमत नहीं बची। पहले दुकानदार सामान तौलता था, अब नोट देखकर ग्राहक की औकात तौलता है। चीनी के लिए नोट बढ़ाया तो खी-खी करके कहने लगा कि मैडम देश का नमक खाइए, चीनी की बात करना देशद्रोह है।’

सुखनंदन ने ठंडे पानी का गिलास देते हुए कहा, ‘प्रिये! आग बाजार में नहीं, सोच में लगी है। इसे दृष्टि दोष कहते हैं। हमें नुकसान देखने की इतनी आदत पड़ गई है कि नफा दिखता ही नहीं। दवा-फीस पर हजारों खर्च किया, तुमने मीठा खाना नहीं छोड़ा, दाम बढ़ते ही नमक पर आ गई। महंगाई की हवा, सौ रोगों की दवा। हमारे देश में अर्थव्यवस्था आंकड़ों से नहीं, शब्दकोश से आंकी जाती है। समस्या का समाधान तलाशने की जगह उपयुक्त शब्द तलाशो। जैसे शेयर बाजार को ही ले लो। बाजार गिरता नहीं, करेक्शन होता है। ज्यादा गिरा तो हेल्दी करेक्शन, फिर गिरे तो वैल्यूएशन रीसेट है। जब पोर्टफोलियो खून से भी ज्यादा लाल हो जाए तो यह लांग टर्म व्यू का वक्त है। तुम्हें न्यू नॉर्मल को समझना होगा। इसमें पेट्रोल जेब नहीं काटता, कार्बन फुटप्रिंट के प्रति संवेदनशील बनाता है। वेतन महीने से पहले खत्म हो जाए तो गरीबी नहीं, कैश फ्लो मिसमैच है।’
‘तो इस दीपावली लक्ष्मी जी से क्या मांगूं?’ सुधर्मा ने सोचते हुए कहा। ‘न्यू नॉर्मल का आर्थिक शब्दकोश मांग लेना, आने वाले समय में पैसे से अधिक इसकी जरूरत पड़ेगी।’ सुखनंदन ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।