अनुशासन का मतलब भय नहीं, समझ पैदा करना

Contributed by: चेतनादित्य आलोक|नवभारतटाइम्स.कॉम•
teach children discipline dont intimidate develop understanding and sensitivity
बच्चों को गलतियों के लिए शारीरिक दंड (कॉरपोरल पनिशमेंट) देने की घटनाएं अक्सर सामने आती रहती हैं। दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भी समाज में कहीं-कहीं ऐसे व्यवहार को उचित ठहराया जाता है। कई शिक्षकों और माता-पिता का तर्क होता है कि वे बच्चों को सुधारने, उन्हें शिष्टाचार सिखाने और बेहतर इंसान बनाने के लिए ऐसा करते हैं। लेकिन, बच्चों को डराकर या पीटकर अनुशासित करने की यह सोच उनके व्यक्तित्व पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। इससे उनमें निराशा, कुंठा और आक्रामकता बढ़ सकती है। चिंता और अवसाद का खतरा बढ़ने के अलावा, बच्चों और उनके माता-पिता व शिक्षकों के बीच भावनात्मक संबंध भी कमजोर हो सकते हैं।

सवाल है कि क्या बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाए और उन्हें मनमानी करने दी जाए? बिल्कुल नहीं। बच्चों को अनुशासन सिखाना और उनकी गलतियों को सुधारना जरूरी है, लेकिन इसके लिए हिंसा का सहारा लेना उचित नहीं। मनोवैज्ञानिक शोध बताते हैं कि सकारात्मक व्यवहार, संवाद और प्रोत्साहन बच्चों के व्यवहार में सुधार लाने में अधिक प्रभावी हो सकते हैं। प्रेमपूर्वक समझाई गई बातें बच्चों को बेहतर ढंग से प्रभावित करती हैं। इसके विपरीत, मारपीट से उनमें भय तो पैदा हो सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वे अपनी गलती को समझकर उसमें सुधार भी करें।
दरअसल, बच्चों के व्यवहार में बदलाव लाने के लिए उनकी भावनाओं और परिस्थितियों को समझना आवश्यक है। कई बार उनकी शरारतों या गलतियों के पीछे जिज्ञासा, असुरक्षा या अपनी बात कहने की इच्छा जैसे कारण हो सकते हैं। प्रेम व्यक्ति के सोचने और व्यवहार करने के तरीके में बदलाव लाने की क्षमता रखता है। बच्चों को बेहतर इंसान बनाने के लिए उन्हें डराने-धमकाने की नहीं, प्रेम, विश्वास और उचित मार्गदर्शन की जरूरत है।

अनुशासन का मतलब बच्चों में भय पैदा करना नहीं, उनमें समझ, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी विकसित करना होना चाहिए। आखिरकार, बच्चों को गलती सुधारने का अवसर देना और सही दिशा दिखाना ही बेहतर परवरिश का आधार है।