आलोचना का सामना

नवभारतटाइम्स.कॉम•
subrahmanyan chandrasekhar journey from criticism to nobel prize
सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर भारत के महान वैज्ञानिकों में से एक थे। बचपन से ही वह तारों को देखकर सोचते कि उनका जीवन कैसे चलता है और उनका अंत कैसे होता है। इंग्लैंड जाते समय भी वह तारों की गणनाएं करते रहे। इन्हीं अध्ययनों के आधार पर उन्होंने तारों के अधिकतम द्रव्यमान की एक महत्वपूर्ण सीमा का सिद्धांत प्रस्तुत किया, जिसे आगे चलकर ‘ चंद्रशेखर लिमिट ’ कहा गया। 1935 में उन्होंने अपना शोध रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी के समक्ष प्रस्तुत किया। हालांकि प्रसिद्ध वैज्ञानिक आर्थर एडिंग्टन ने उनके सिद्धांत का विरोध किया। इतनी बड़ी आलोचना के बावजूद चंद्रशेखर ने अपना शोध जारी रखा। उनका विश्वास था कि विज्ञान में किसी विचार की महत्ता लोगों की तत्काल स्वीकृति से नहीं, बल्कि गणनाओं और प्रमाणों से तय होती है। अंततः उनके काम को वैज्ञानिक जगत में व्यापक मान्यता मिली। 1983 में उन्हें तारों की संरचना और विकास से संबंधित महत्वपूर्ण सैद्धांतिक अध्ययनों के लिए भौतिकी का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। उनके जीवन से सीख मिलती है कि आलोचना से घबराकर अपने काम से पीछे नहीं हटना चाहिए।