राम को इतिहास में नहीं, वर्तमान में ढूंढ़ना होगा

Contributed by: जयति गोयल|नवभारतटाइम्स.कॉम•
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राम तो सदियों से थे, आज भी हैं और हमेशा रहेंगे। किसी युग में राम के रूप में सत्य की महिमा प्रकट हुई तो किसी में कृष्ण के रूप में प्रेम की, तो कभी बुद्ध के रूप में करुणा की। हर भाषा में रामकथाएं कही गई हैं। फिलिपींस, लाओस, मंगोलिया, साइबेरिया, मलेशिया, म्यांमार, स्याम, इंडोनेशिया, जावा, सुमात्रा, कंबोडिया, चीन, वियतनाम - सभी में रामकथा के ढेरों स्वरूप मौजूद हैं।

इससे स्पष्ट है कि यदि राम केवल राजा होते, तो शायद उनकी स्मृति भी कब की क्षीण हो चुकी होती और वह इतिहास बनकर रह गए होते। राम इतिहास नहीं हैं वह तो हर पल नए और वर्तमान हैं। अपना कोई धर्म-पंथ न चलाते हुए भी धर्म का आदि और अंत हैं। मौजूदा दौर का सवाल थोड़ा दुरुह है। क्या यह राम विचार का विश्राम है। जब राजनीति के राम ‘जय श्रीराम’ हैं। राम की भूमिका राष्ट्र निर्माण के किस रूप में अवतरित हों? आज यह यक्ष प्रश्न भारतीय चित्त की बड़ी चुनौती है। श्रीराम के यश और आदर्शों का प्रभाव इतना अधिक था कि मुगल शासक अकबर ने भी 16-17 वीं शताब्दी के बीच उनके आदर्शों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए सिक्के जारी किए थे। जब तीर्थ यात्री अयोध्या जाते थे तो उन्हें मंदिर से यह सिक्का मिलता था। इन सिक्कों के एक भाग पर राम दरबार का दृश्य अंकित है, जो रामराज्य के राजसी वैभव और समृद्धता को दर्शाता है।
आइए देखते हैं कि कौन सी चीज राम को इतना असाधारण बनाती है। कई हजार साल पहले, जब दुनिया के अधिकांश हिस्सों में शासक सिर्फ विजेता थे, जो अक्सर बर्बर हुआ करते थे- उस समय राम ने मानवता, त्याग और न्याय की अनुकरणीय भावना का प्रदर्शन किया। उनका आदर इसलिए नहीं किया जाता कि वह बाहरी दुनिया के विजेता थे, वह भीतरी जीवन के विजेता हैं, क्योंकि वह विपरीत परिस्थितियों में डगमगाते नहीं हैं। रावण वध के समय भी उनकी आंखों में क्रोध नहीं दिखता, वह गिरे हुए रावण के शव के पास आते हैं और उन्हें जो कार्य करना पड़ा, उसके लिए पश्चाताप करते हैं। अपने जीवन की सारी चुनौतियों के बीच, वह कभी अपना संतुलन नहीं खोते, कभी मन में कड़वाहट या प्रतिशोध नहीं रखते।