विपक्ष का साथ आना सफलता,लेकिन यह वोट की गारंटी नहीं

नवभारतटाइम्स.कॉम•
opposition unity is a success but not a guarantee of votes analysis
राजनीतिक आंदोलनों की सफलता दो बातों पर निर्भर करती है। पहला, मुद्दे जनता से कितने जुड़े हैं और उन्हें जमीन पर लगातार व प्रभावी ढंग से उठाया जा रहा है या नहीं। दूसरा, सरकार परेशान होकर अगर कोई गलत कदम उठा लेती है, तो उसका लाभ लेने की कितनी तैयारी है। राहुल गांधी के नेतृत्व में चुनाव आयोग , SIR और नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ चल रहे आंदोलन को इन कसौटियों पर परखें तो तस्वीर उतनी सीधी नहीं दिखती, जितनी दिल्ली के माहौल से लग रही है।

हार का सिलसिला । राहुल ने प्रदर्शन से माहौल जरूर गरमाया है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि आगामी चुनावों में कांग्रेस को लाभ और BJP को नुकसान होगा ही। हाल के विधानसभा और लोकसभा उपचुनावों के अलावा गुजरात, त्रिपुरा और राजस्थान के स्थानीय निकाय व पंचायत चुनावों में कांग्रेस को निराशा मिली।
राहुल की सफलता । यह कहना भी सही नहीं होगा कि इस आंदोलन का कोई परिणाम नहीं निकलेगा। राहुल गांधी की व्यक्तिगत राजनीतिक सफलता यह है कि उन्होंने BJP विरोधी पार्टियों को अपने नेतृत्व में एकजुट कर लिया। हालांकि, कुछ परिस्थितियां भी ऐसी थीं कि कई पार्टियों के पास दूसरा विकल्प नहीं था। पश्चिम बंगाल में चुनावी हार के बाद ममता बनर्जी की स्थिति ऐसी नहीं है कि वह कोई बड़ा स्टैंड ले सकें। वामपंथी पार्टियों की हालत सबके सामने है। बिहार में तेजस्वी यादव को कांग्रेस से पहले भी समस्या नहीं थी। उत्तर प्रदेश में SP के लिए आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर BJP को घेरना और विपक्षी एकता को मजबूत दिखाना जरूरी था।

पुराना पैटर्न । दिल्ली की सड़कों पर नरेंद्र मोदी और BJP के खिलाफ भीड़ जुटाना व मीडिया कवरेज से माहौल बनाना बहुत मुश्किल नहीं है। पिछले छह वर्षों के आंदोलनों को देखें तो मोदी और BJP विरोधी एक बड़ा समूह हर विरोध-प्रदर्शन में पहुंचता रहा है। इसमें मुस्लिम संगठनों, एनजीओ, एक्टिविस्टों, राजनीतिक दलों और छात्र संगठनों की भागीदारी रही है। इस बार भी यही है। CJP ने मुंबई और बेंगलुरु में माहौल बनाने की कोशिश की, लेकिन भीड़ नहीं मिली। अब अभिजीत दीपके राहुल और कांग्रेस के साथ संबंध बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

दबाव नहीं । मुख्य सवाल है कि क्या BJP के प्रभाव वाले दूसरे क्षेत्रों में भी ऐसा सरकार विरोधी माहौल बनाया जा सकता है? BJP के प्रवक्ता लगातार राहुल गांधी और आंदोलन पर हमले कर रहे हैं, यानी पार्टी इसे गंभीरता से ले रही है। लेकिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सामान्य तरीके से अपने कार्यक्रम करते दिख रहे हैं। आंदोलन का दबाव सरकार पर पड़ रहा हो, ऐसे प्रमाण अभी नहीं दिखते।

बदली राजनीति । वर्तमान राजनीति का दुखद यथार्थ यह है कि जनता के मुद्दों पर लंबे समय तक संघर्ष करने वाले नेता अब बहुत कम हैं। जमीन पर आंदोलन करके राजनीति में आने वाले नेता उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। विचारधारा और मुद्दों के प्रति निष्ठा का भी अभाव है। ऐसे में राजनीतिक दल न लंबी लड़ाई की योजना बना पाते हैं, न दीर्घकालीन संघर्ष खड़ा कर पाते हैं।

मुद्दों की बात । Special Intensive Revision (SIR) की प्रक्रिया में शुरुआत में कुछ मतदाताओं को परेशानी होती है, लेकिन धीरे-धीरे समाधान हो जाता है। इसलिए राहुल जितनी बड़ी संख्या बताते हैं, उतने लोग प्रभावित नहीं होते। फिर, आंदोलन मुख्य चुनाव आयुक्त और SIR पर केंद्रित है, जबकि मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।

दबाव की कोशिश । सुप्रीम कोर्ट की कुछ टिप्पणियां चुनाव आयोग और सरकार के लिए असुविधाजनक जरूर रही हैं, लेकिन मौखिक टिप्पणियों और अंतिम फैसलों में अंतर होता है। INDIA गठबंधन ने राष्ट्रपति से मिलकर वोट चोरी के आरोप लगाए। सवाल यह है कि क्या राष्ट्रपति को चुनाव आयोग को बर्खास्त करने का अधिकार है? राहुल गांधी की रणनीति यह संदेश फैलाने की है कि संवैधानिक संस्थाएं सरकार के दबाव में हैं। सरकार ने आंदोलन की प्रतिक्रिया में अभी तक ऐसी कोई गलती नहीं की है, जिससे कि विपक्ष को सरकार विरोधी माहौल बनाने का मौका मिले।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं )

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