जगह ऐसी हो, जहां से आवाज़ सत्ता तक पहुंचे

नवभारतटाइम्स.कॉम•
voice from jantar mantar to power the question of right to protest and space in democracy
पूनम पाण्डे

लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सिर्फ धरने पर बैठने या नारेबाजी तक सीमित नहीं, बल्कि अपनी बात उन लोगों तक पहुंचाने का अधिकार भी है, जिनके पास फैसले लेने की ताकत है। किसी आम नागरिक को जब लगता है कि उसकी बात नहीं सुनी जा रही तो वह आखिर कहां जाए? किसी सरकारी दफ्तर में आवेदन दे, जनप्रतिनिधि से मिले या अपनी मांग लेकर सड़क पर उतरे? लोकतंत्र में इन सभी रास्तों की अपनी जगह है। इसलिए जब कोई अपनी शिकायत फैसला लेने वालों तक पहुंचाना चाहता है तो ऐसी जगह की अहमियत बढ़ जाती है, जहां से उसकी आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुंच सके।
दिल्ली का जंतर-मंतर ऐसी ही एक जगह रहा है। यहां अलग-अलग मुद्दों पर विरोध-प्रदर्शन, धरने होते रहे हैं। कभी कोई बड़ा संगठन आंदोलन करता है तो कभी अकेला नागरिक भी इस उम्मीद से यहां धरने पर बैठा मिलता है कि उसकी बात कभी तो सत्ता के कानों तक पहुंचेगी। विभिन्न विचारधारा और विभिन्न शिकायतें, सबके लिए यहां जगह रही है। इसीलिए जंतर-मंतर को निर्धारित प्रोटेस्ट साइट की सूची से हटाने का फैसला सिर्फ जगह बदलने का मामला नहीं। यह भी सवाल उठता है कि लोकतंत्र में असहमति के लिए जगह कितनी जरूरी है और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखते हुए भी इस असहमति के लिए जगह को कैसे सुरक्षित रखा जा सकता है।

हर प्रदर्शन के पीछे एक कहानी

धरने पर बैठे लोगों को अक्सर भीड़ के रूप में देखा जाता है। लेकिन, उस भीड़ में गहरी व्यथा और किसी की वर्षों पुरानी शिकायत हो सकती है। किसी के लिए नौकरी का सवाल हो सकता है, तो किसी के लिए भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का। किसी भी असहमति और शिकायत को कहने व उसे सुनने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र की खूबी यही है कि वह असहमति के लिए भी जगह देता है। जंतर-मंतर की पहचान भी इसी से बनी है। शहर की व्यवस्था, ट्रैफिक, सुरक्षा और आसपास रहने वाले लोगों की सुविधाएं भी अहम हैं। लेकिन, असहमति जताने के अधिकार और लोगों की सुविधाओं व व्यवस्था को आमने-सामने खड़ा करने की बजाय उसमें संतुलन बनाने की जरूरत है।

व्यवस्था की परीक्षा

दिल्ली पुलिस ने रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के CBD ग्राउंड को वैकल्पिक स्थल बनाने की जानकारी दी है। पुलिस ने इस फैसले के पीछे समिति की सिफारिशों का हवाला दिया। किसी भी प्रोटेस्ट साइट की अहमियत तभी होगी, जब वहां तक पहुंचना आसान हो और अनुमति की प्रक्रिया स्पष्ट हो। लेकिन, सबसे जरूरी यह है कि वो ऐसी जगह हो जहां से नागरिकों को यकीन हो कि उनकी आवाज सत्ता तक पहुंच रही है। प्रदर्शन का महत्व सिर्फ इस बात से ही नहीं होता कि कितने लोग जुटे या कितने नारे लगे। मकसद उस मसले को सार्वजनिक चर्चा में लाना होता है।

जंतर-मंतर का सवाल किसी एक आंदोलन, दल या सरकार तक सीमित नहीं है। यह उस व्यवस्था की परीक्षा है जिसमें नागरिक अपनी बात कह सकें, प्रशासन व्यवस्था बनाए रख सके और सत्ता असहमति को लोकतंत्र का हिस्सा मानकर उससे संवाद कर सके। लोकतंत्र में हर नागरिक को यह भरोसा जरूर होना चाहिए कि उसकी बात रखने का रास्ता खुला है और उसकी आवाज सुने जाने की संभावना बनी हुई है।

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