मां से भेदभाव क्यों

नवभारतटाइम्स.कॉम
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मातृत्व अवकाश से जुड़ा दिल्ली हाई कोर्ट का एक हालिया फैसला उस समस्या को संबोधित करता है, जिसके कारण महिलाओं को अक्सर मां बनने की कीमत अपने करियर में चुकानी पड़ती है। अदालती आदेश से साफ है कि मैटरनिटी लीव और उसके बाद वही वेतन व पद ही काफी नहीं हैं। सम्मान और आगे बढ़ने के मौके भी बराबर मिलने चाहिए।

असली मकसद । यह केस एक चार्टर्ड अकाउंटेंट से जुड़ा है। छुट्टी पर जाने से पहले वह मैनेजर पद पर थीं। आरोपों के मुताबिक, जब वह वापस लौटीं तो उनका ट्रांसफर एक दूसरे डिपार्टमेंट में कर दिया गया। वहां न पहले की तरह जिम्मेदारी थी और न काम। कोर्ट ने कंपनी की दलीलों को ठुकराते हुए साफ किया कि मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट, 1961 केवल मातृत्व अवकाश के दौरान महिला को नौकरी से निकाले जाने से सुरक्षा नहीं देता- यह गर्भावस्था या अवकाश के कारण सेवा की शर्तों में उन बदलावों से भी बचाता है, जिनसे महिला को करियर में नुकसान हो सकता है।
कानून का दायरा । अदालत का फैसला उन भेदभावों को भी कानून के दायरे में लेकर आता है, जिन्हें आमतौर पर नजरअंदाज कर दिया जाता है। जरूरी नहीं है कि असमानता का व्यवहार हमेशा स्पष्ट रूप से दिखाई ही दे। कार्यस्थल पर जाने-अनजाने ऐसी परिस्थितियां बनाई जा सकती हैं, जिनसे कोई महिला असहज महसूस करे, जैसा कि इस केस में हुआ। फिर, पीड़ित महिला की शिकायत थी कि कंपनी में क्रेच सुविधा नहीं है। यह एक और गंभीर समस्या है। पिछले दिनों श्रम मंत्रालय ने संसद में बताया था कि कार्यस्थलों पर क्रेच की व्यवस्था और उसके पालन का कोई केंद्रीय डेटा या व्यापक ऑडिट नहीं है। यानी कानून के बावजूद यह साफ नहीं है कि कितने संस्थान इसका पालन कर रहे हैं।

देश की जरूरत । आज महिलाओं का वर्कफोर्स में शामिल होना देश की बढ़ती इकॉनमी की भी जरूरत है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी 2023-24 में 41.7% थी। पिछले दशक के मुकाबले आंकड़े बेहतर जरूर हुए हैं, पर विकसित मुल्कों के सामने अब भी कम हैं। एक स्टडी के मुताबिक, भारत इस गैप को भर देता है तो अर्थव्यवस्था में 700 अरब डॉलर से लेकर 1.4 ट्रिलियन डॉलर तक जुड़ सकते हैं।

समर्थन चाहिए । महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए उन्हें काम का बेहतर माहौल और बराबर अधिकार देने होंगे। मां बनना जीवन का सबसे अनमोल अनुभव है। इससे गुजरने के बाद कोई महिला और भी मजबूत होकर उभरती है। घर-बाहर की दोहरी जिम्मेदारी उठाने के कारण जरूरत है कि समाज भी उनके समर्थन में खड़ा हो।