No Discrimination In Job After Motherhood Historic Decision By Delhi Hc 10 Lakh Compensation
मातृत्व के बाद नौकरी में भेदभाव नहींः HC
नवभारतटाइम्स.कॉम•
nNBT रिपोर्ट, नई दिल्ली
दिल्ली हाई कोर्ट ने मातृत्व और कामकाजी महिलाओं के अधिकारों पर एक अहम फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा है कि मां बनने को किसी महिला के पेशेवर नुकसान या वर्कप्लेस (काम वाली जगह) पर अपमान का आधार नहीं बनाया जा सकता।हाई कोर्ट ने एक निजी नियोक्ता को चार्टर्ड अकाउंटेंट राखी बिष्ट को ₹10 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया। इसके अलावा ₹1.5 लाख मुकदमा खर्च भी देने को कहा गया है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह छह महीने के अंदर कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी, 2020 के तहत जरूरी नियम या योजना बनाए । इसका मकसद मैटरनिटी के बाद काम पर लौटने वाली महिलाओं के अधिकारों की प्रभावी सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
31 अगस्त को सुनाए गए फैसले में जस्टिस सचिन दत्ता ने कहा कि मैटरनिटी लीव के बाद काम पर लौटने वाली महिला को उसकी पुरानी पोस्ट या उसके समकक्ष भूमिका मिलनी चाहिए। केवल वेतन और पदनाम बचाए रखना पर्याप्त नहीं है। कोर्ट ने कहा कि समान भूमिका का मतलब समान वेतन, काम का दर्जा, जिम्मेदारियां और सुपरवाइजरी अधिकार भी हैं। कर्मचारी के करियर की संभावनाएं भी सुरक्षित रहनी चाहिए।
राखी बिष्ट CA हैं। उनके पास करीब 14 साल का पेशेवर अनुभव है। मैटरनिटी लीव से पहले वह ट्रेजरी विभाग में मैनेजर थीं। लीव के दौरान उनकी पुरानी पोस्ट पर दूसरे कर्मचारी को प्रमोट कर दिया गया। बिष्ट के लौटने पर उन्हें कम महत्व वाली जिम्मेदारियां सौंप दी गईं। कोर्ट के अनुसार, उनकी भूमिका व्यावहारिक रूप से क्लर्क स्तर के काम तक सीमित कर दी गई।
जस्टिस दत्ता ने नियोक्ता (employer) के रवैये पर कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के साथ मानो “स्पेयर कैपेसिटी” की तरह व्यवहार किया गया। उन्हें वहां भेज दिया गया, जहां कोई अन्य साथी कर्मी उन्हें लेने के लिए तैयार था। नियोक्ता ने दलील दी थी कि बिष्ट का वेतन और पदनाम नहीं बदला गया। इसलिए मैटरनिटी कानून का उल्लंघन नहीं हुआ। कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट की सुरक्षा सिर्फ नौकरी से निकाले जाने या वेतन घटाने तक सीमित नहीं है। “सेवा की शर्तों” में काम का दर्जा, रिपोर्टिंग हायरार्की और सार्थक जिम्मेदारियां भी शामिल हैं।
कोर्ट ने कहा कि गर्भावस्था और मातृत्व संरक्षित स्थितियां हैं। ये संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 से जुड़े हैं।