व्यंग्य कहां है?

नवभारतटाइम्स.कॉम
the search for satire is the officers pain publics applause or attack on dynastic politics where is the real satire hidden
'रबी सीजन में गन्ने की फसल आई, तो दाम कम थे, किसानों को फायदा नहीं मिला। अब चीनी के दाम बढ़ रहे हैं, तब भी किसानों को लाभ नहीं हो रहा। सारा फायदा बिचौलिए ले जा रहे। यह बहुत तकलीफ की बात है। मेरा दिल फटा जा रहा। ऐसा दुख जताया एक आला अफसर ने। पब्लिक धन्य हुई। अपना सिर पीटकर ताली बजाई। पर सवाल न पूछ पाई कि हे नरपुंगव! समय रहते सही-गलत पकड़ने की जिम्मेदारी किसकी है?'

एक सांस में पूरा पैराग्राफ खत्म कर अगले ने जरा संकोच से उम्मीद भरी दृष्टि धीर-गंभीर मुद्रा वाले महानुभाव पर डाली। संपादकीय कक्ष की हवा में काफी तनाव था। व्यंग्य कार को लेकिन पूरा विश्वास था कि जो परोसा, उसमें तंज है। पर सवाल आया, 'यह व्यंग्य है? अफसर इतनी तकलीफ में है कि अब रोया कि तब रोया। इसमें हंसने की बात कहां है?' व्यंग्यकार ने हिम्मत बटोरी और अगला पीस सुना डाला, 'अकबर ने अपने दरबार में राजा टोडरमल और राजा बीरबल जैसों को नवरत्न बनाया था। उसे वोट भी नहीं लेना था, फिर भी ऐसा किया, लेकिन...।' बात पूरी होती, उससे पहले ही कमरे में बिजली-सी कड़की, 'कुछ समझ में नहीं आता क्या?'
व्यंग्यकार गिरते-गिरते बचा। संभलकर आंख बंद की, मानो इतिहास और राजनीति शास्त्र में गोते लगा रहा हो। फिर शुरू हो गया, 'ब्रिटेन के राजवंश से दो-दो हाथ करने वाली पार्टी वंशवाद के ही दलदल में फंसी हुई है। अब तो...।' बात पूरी होने के पहले ही मेज थपथपाने की आवाज आई। 'इसमें है दम। बढ़ाओ इसे।' व्यंग्यकार ने राहत की सांस ली। महीनेभर से इंतजार कर रहे उसके बच्चे के लिए आखिरकार किताब खरीदने का इंतजाम हो गया।